भारत विश्व का एक मात्र ऐसा देश है जहां की लगभग तीन चौथाई आबादी कृषि और संबद्ध क्षेत्र से जुड़ी हुई है। जाहिर सी बात है, हमारी अर्थव्यवस्था में भी कृषि का महत्वपूर्ण योगदान है। कृषि क्षेत्र खाद्यान्न और कच्ची सामग्री तो उपलब्ध कराता ही है, अपितु एक बड़े हिस्से के लिए रोजगार का साधन भी है। आज जब हम आजादी का अमृत महोत्सव मनाने जा रहे हैं, तब कृषि क्षेत्र के विकास के लिए सरकार की योजनाओं की चर्चा स्वाभाविक है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आठ वर्षों के दौरान किसानों की मूलभूत समस्याओं पर गंभीर चिंतन किया है। हर बजट में कृषि क्षेत्र के विकास के लिए पर्याप्त राशि का आवंटन किया गया। अनेक लाभकारी योजनाएं शुरू हुईं। प्रधानमंत्री ने किसानों को हमेशा इसके लिए प्रोत्साहित किया कि वे कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक पद्धति के साथ ही परंपरागत प्राकृतिक खेती के लाभों को नजरंदाज न करें। इसके लिए केंद्र सरकार ने बाकायदा एक अभियान शुरू किया है। हरियाणा, गुजरात आंध्रप्रदेश और हिमाचल सहित कुछ राज्यों के किसान अब प्राकृतिक खेती करने लगे हैं।
प्राकृतिक खेती एक ओर जहां खेती को सुगम बनाकर किसानों की आय बढ़ाने में उपयोगी है, वहीं दूसरी ओर मृदा संरक्षण में भी प्राकृतिक खेती मददगार साबित हो रही है। गत वर्ष गुजरात में आयाेिजत सम्मेलन में प्रधानमंत्री ने देश के किसानों से मां भारती की धरा को रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों से मुक्त कराने का पुनीत संकल्प लेने की मार्मिक अपील भी की थी।
प्रधानमंत्री ने कहा था, प्राकृतिक खेती में देश के उन 80 प्रतिशत किसानों को लाभ पहुंचाने की क्षमता है, जिनके पास दो हेक्टेयर से भी कम जमीन है। केमिकल और फर्टिलाइजर ने हरित क्रांति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, परंतु मनुष्य के स्वास्थ्य पर इसके हानिकारक प्रभावों को देखते हुए इसके विकल्पों पर भी गंभीरता से विचार करना होगा।
केंद्र सरकार द्वारा परंपरागत कृषि विकास योजना की उपयोजना के अंतर्गत चार लाख हेक्टेयर क्षेत्र को प्राकृतिक खेती के दायरे में लाया गया है। प्राकृतिक खेती की अवधारणा को सबसे पहले 1975 में जापान के किसान दार्शनिक मासानोबू फुकुओका ने अपने शोधपूर्ण ग्रंथ ‘वन स्ट्रा रिवोल्यूशन’ में प्रस्तुत किया था। पद्मश्री सुभाष पालेकर ने 1990 के दशक में विदर्भ क्षेत्र के अमरावती में स्थित अपने खेत में प्राकृतिक खेती का प्रयोग किया तो उन्हें लाभकारी परिणाम मिले थे। जबकि उस समय विदर्भ के किसान भयावह सूखे का सामना कर रहे थे।
पानी की कमी से जूझने वाले किसान इस पर अवश्य ध्यान दें कि प्राकृतिक खेती में पौधों को पानी की नहीं बल्कि नमी की आवश्यकता होती है। इस प्रणाली से पहले साल 50% पानी की बचत होती है, जो तीसरे साल में 70 फीसदी तक पहुंच जाती है। प्राकृतिक खेती के द्वारा एक साल में तीन फसलें भी ली जा सकती हैं।
मोदी सरकार ने किसानों की समृद्धि के लिए कृषि सुधारों का व्यवस्थित सिलसिला शुरू किया। किसान सम्मान निधि, फसल बीमा योजना और न्यूनतम समर्थन मूल्यवृद्धि जैसे कदम उठाए। 75,000 हेक्टेयर क्षेत्र को प्राकृतिक खेती दायरे में लाने का लक्ष्य निर्धारित है, जिसके लिए 15 लाख किसानों को प्रशिक्षित किया जाएगा। इसके लिए 20 लाख नेशनल फील्ड स्कूल खोले जाएंगे। देशभर के 30 हजार ग्राम प्रधानों के लिए 750 प्रशिक्षण सत्र आयोजित होंगे। मेरी किसानों से अपील है कि वे प्राकृतिक खेती मिशन की सफलता में अपनी सहभागिता सुनिश्चित कर आजादी के अमृत महोत्सव वर्ष में कृषि को नई ऊंचाइयों तक ले जाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दें।