Birthday – समर्थक क्यों ,मानते हैं ,पंडित जी, को एक ,बड़ी हस्ती

पंडित जी के नाम से मशहूर दीन दलाल उपाध्याय का आज जन्मदिन है. इसी दिन उनकी याद में अन्तयोदय दिवस…
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पंडित जी के नाम से मशहूर दीन दलाल उपाध्याय का आज जन्मदिन है. इसी दिन उनकी याद में अन्तयोदय दिवस भी मनाया जाता है. वे भारतीय राजनेता, राष्ट्रीय स्वयं सेवक के बड़े विचारक और संगठनकर्ता थे. हिंदूत्व की विचारधारा से गहराई से जुड़े होने के बाद भी दीनदयाल उपाध्याय को एक अलग विलक्षण विचारधारा से जोड़ कर देखा जाता है.

पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जन्म 25 सितम्बर 1916 को उत्तर प्रदेश के मुथरा के पास नागला में हुआ था. पिता भगवती चरण उपाध्याय रेववे में सहयाक स्टेशन मास्टर थे. जब पंडित दीनदयाल उपाध्याय केवल आठ साल थे तब ही उनके माता पिता का निधन हो गया और उनकी परवरिश उनके मामा ने किया. बचपन से बड़े होते तक उन्होने माता पिता के बाद नाना, मामी, भाई, नानी को एक एक कर खोते गए और उनके अंदर विरक्ति भाव पैदा हुआ.

संघ से जुड़ाव
कॉलेज के दिनों में ही उनका संघ से परिचय हुआ और उसके संस्थापक हेडगेवार से निरंतर बौद्धिक परिचर्चाएं होने लगी. लेखन से उनका गहरा लगाव था और उन्होंने राष्ट्रीय धर्म नाम की मासिक पत्रिका का प्रकाशन लखनऊ में शुरू किया. इसके बाद उन्होंने साप्ताहिक पंचजन्य और दैनिक स्वदेशी की भी शुरुआत की.

खुद की एक अलग विचारधारा
पंडित दीनदयाल उपाध्याय की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वे संघ प्रचारक होने के बाद भी खुद की विचारधारा के लिए पहचाने गए.  यह उनके लेखन का ही कौशल ही था. जिसने संघ की विचारधारा को लोगों में प्रसारित प्रचारित किया.

क्या था एकात्म मानववाद
पंडित दीनदयाल उपाध्याय का मानना था कि भारत के स्वदेशी आर्थिक विकास के लिए बहुत जरूरी है कि उसके केंद्र में मानव को रखा जाए.यह विचारधारा समाजवाद और पूंजीवाद दोनों से ही हटकर थी. उनका मानना था कि जब तक कमजोर वर्ग का उत्थान नहीं होगा, देश का विकास संभव नहीं है. उनकी विचारधारा से प्रभावित होकर ही श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने कहा था,  “मुझे दो दीनदयाल उपाध्याय दे दीजिए, मैं पूरी तरह से देश का चेहरा बदल दूंगा.”

जौनपुर चुनाव में हार
एक बेहतरीन संगठनकर्ता होने के बाद भी राजनीति की  नकारात्मक उठापटक उन्हें कभी रास नहीं आई. शायद यही वजह रही के  वे खुले मन से 1963 में हुए जौनपुर के लोकसभा उपचुनाव को नहीं लड़ सके, जिसके लिए उनकी उम्मीदवारी पूरे देश में चर्चित रही.

रहस्यमयी मृत्यु
इसमें शायद ही किसी को संदेह हो कि दीन दयाल उपाध्याय देशभर में बहुत लोकप्रिय थे.
11 फरवरी, 1968 की दोपहर उत्तरप्रदेश के मुगलसराय स्टेशन पर दीनदयाल उपाध्याय का शव संदिग्ध अवस्था में पाया गया. उनके समर्थकों का आरोप था कि उनकी हत्या की गई है. उनकी मृत्यु की सीबीआई जांच भी हुई. लेकिन उनकी मौत अभी तक एक रहस्य बनी हुई है.

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