गुरुदेव रबींद्रनाथ ठाकुर का निधन 7 मई 1941 को हुआ था.1940 में तो जब उनकी तबियत खराब हुए तो वे कभी ठीक नहीं हो सके. उन्हें यूरिमिया (Uremia) तो हुआ ही था, लेकिन वास्तव में उन्हें प्रोस्टेट कैंसर (Prostate Cancer) से पीड़ित थे.7 अगस्त को उनकी पुण्यतिथि पर गुरदेव को याद किया जा रहा है. 1941 में 80 साल की उम्र में यूरीमिया की वजह से उनका निधन हो गया था.
गुरुदेव रबींद्रनाथ ठाकुर (Gurudev Rabindranath Tagore) भारत (India) और बंगाल के बहुमखी प्रतिभासंपन्न विद्वान थे. वे एक कवि, लेखक, नाटककार , संगीतकार, दार्शनिक, चित्रकार, और समाज सुधारक थे. उन्होंने बंगाल के साथ साथ भारतीय संस्कृति, संगीत और कला को नए आयाम दिए थे. उनकी रचनाओं की ख्याति देश की सीमाओं को तोड़कर यूरोप तक जा पहुंची थी और वे साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार (Nobel Prize for literature) पाने वाले पहले गैर यूरोपीय बने थे.
लेखन और काव्य- 8 साल की उम्र मे रबींद्रनाथ ने पहली कविता लिखी थी और 16 साल की उम्र में ही उनकी कविता का संकलन छप गया था. इसके बाद उन्होंने छोटे कहानियों और नाटकों का संकलन अपने ही नाम से छपवाया था. उनकी अनेक रचनाओं ने बांग्ला साहित्य को नई ऊंचाइयां प्रदान की जिनमें गीतांजली, गोरा, घरे बाइरे, काफी चर्चित और प्रसिद्ध रहीं.
संगीत से गहरा नाता- भारत और बांगलादेश का राष्ट्रगान तो उनका लिखा और संगीतबद्ध किया है ही. श्रीलंका का राष्ट्रगान भी उनकी रचन से ही प्रेरित है. लेखन के अलावा उन्होंने अपने लिखे 2230 गीतों को संगीतबद्ध किया है जिन्हें रबींद्र संगीत के नाम से जाना जाता है. उनके संगीत में हिंदुस्तानी संगीत की ठुमरी का प्रभाव दिखाई देता है.
आइंस्टीन से लेकर गांधीजी तक- गुरुदेव रबींद्रनाथ स्वामी विवेकानंद के बाद दूसरे ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने विश्व धर्म संसद को संबोधित किया. ऐसा उन्होंने दो बार किया था. उनका अल्बर्ट आइंस्टीन से प्रकृति पर संवाद बहुत प्रसिद्ध रहा था. खुद महात्मा गांधी से भी उनका गहरा रिश्ता था. बापू को महात्मा की उपाधि गुरुदेव ने ही दी थी. गांधी जी ने खुद उनकी आर्थिक सहायता की थी जब वे शांतिनिकेतन के लिए घूम घूम कर नाटकों का मंचन कर पैसा कमा रहे थे. गांधी से वैचारिक मतभेदों पर गुरुदेव काफी मुखर थे और गांधी जी भी उनका बहुत सम्मान करते थे.