भोजपुरी सिनेमा में हैं चर्चित अभिनेत्री बंदिनी मिश्रा। उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर से बचपन में ही मां का दामन छोड़ मुंबई चली आईं बंदिनी भोजपुरी की सुपरहिट फिल्म ‘पान खाए सइंया हमार’ की हीरोइन रही हैं। उसके पहले हिंदी फिल्मों में भी उन्होंने खूब काम किया। लेकिन, सिनेमा में उनके योगदान को असल पैमाना हैं उनकी वे फिल्में जिनमें उन्होंने भोजपुरी के दिग्गज सितारों की मां के रोल निभाए।
तो चलिए मिलते हैं भोजपुरी सिनेमा की चर्चित अभिनेत्री बंदिनी मिश्रा से और जानते हैं उनके अब तक के सफर के बारे में.
मां बनने के बाद समझ आया मां का दर्द
मैं चार साल की थी जब उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर से अपने पापा के साथ मुंबई आ गई। मां गांव में रहती थी और कभी कभी मुंबई आती थी। उस समय मेरे प्रति मेरी मां की क्या पीड़ा रही होगी, ये जब मैं मां बनी तो समझ पाई। ये एहसास मुझे आगे फिल्मों में अभिनय में भी काम आए। भोजपुरी सुपर स्टार दिनेश लाल यादव निरहुआ के साथ मैंने ‘दीवाना’ ‘सात सहेलियां’ जैसी कई फिल्में उनकी मां बनकर की हैं। असल जीवन में मेरे दो बेटियां हैं। दोनों ही अब आत्मनिर्भर हैं और लंदन में रहती हैं। मां परदे पर हो या निजी जिंदगी में, उसे अपने बच्चों को काबिल बनते देखने में ही असली सुख मिलता है।
मां ने मेरे लिए बहाया खून पसीना ‘मैं असल जीवन में मां बनी तो मुझे ममता का और मां का असल मतलब समझ आया। फिल्मों में मां बनने का अनुभव भी अनोखा रहा। मैंने एक फिल्म की ‘खून पसीना’। इसमें मेरे दो बेटे हैं। एक का किरदार पवन सिंह और दूसरे बेटे का किरदार दिनेश लाल यादव ने निभाया है। इस फिल्म में मेरा किरदार हिंदी फिल्म ‘करन अर्जुन’ की राखी की तरह है। वैसा ही संघर्ष है जैसा संघर्ष मेरी मां ने मेरे लिए किया। आज अगर मैं इस मुकाम तक पहुंची हूं तो इसमें मेरी मां का बहुत योगदान है। शुरू में तो मैं मुंबई में अपने पिता के साथ अकेली ही थी, बाद में मेरी मां भी मुंबई आ गई। मेरे बच्चों के लालन पालन में उनकी नानी का भी बड़ा योगदान है।
मां का दुलार, बच्चों का संसार- मेरी दो बेटियां हैं और दोनों लंदन में पढ़ती हैं और वे वही अपना करियर बनाना चाहती हैं। मैं चाहती हूं कि कम से कम मेरी एक बेटी तो मेरे साथ रहे लेकिन उन दोनों को वही रहना है। मेरा आशीर्वाद उनके साथ हमेशा रहता है वे चाहें जहां भी रहें। उनके सुख में ही मेरा सुख है। ऐसा ही बच्चे जैसा एक कलाकार भोजपुरी सिनेमा का भी है जो मेरे सामने ही काम करते करते बड़ा हुआ। नाम है, प्रदीप पांडे। उसे मैं तब से जानती हूं जब वह छोटा था। परदे पर मैं उसकी भी मां बनी फिल्म ‘दुलारा’ में। वह वाकई मेरा दुलारा भी है।
साथ रहेगा मां का आशीर्वाद’- मैं अब तक करीब 80 भोजपुरी फिल्मों में मां की भूमिकाएं निभा चुकी हूं। एल वी प्रसाद की 1972 में रिलीज हुई फिल्म ‘शादी के बाद’ से मैंने बाल कलाकार के रूप में काम शुरू किया था। राजश्री प्रोडक्शंस की फिल्म ‘पायल की झंकार’ में कोमल महुआकर के साथ मैं सेकेंड लीड हीरोइन रही। फांसी के बाद’, ‘प्यार मोहब्बत’, ‘आगे की सोच’ और ‘खोल दे मेरी जुबान’ जैसी फिल्में भी की। मां का सहयोग ही रहा कि मैंने कथक में विशारद उत्तीर्ण किया। इस बात का दुख मुझे जिंदगी भर रहेगा कि अंतिम समय में अपनी मां के पास नही थी। पिछले साल जब उनकी मृत्यु हुई तब मैं लंदन में थी और अपने मां के अंतिम दर्शन नहीं कर पाई। मेरी ये पीड़ा जिंदगी भर मेरे साथ रहेगी।