जानिये, शास्त्र के अनुसार श्राद्ध का अधिकार किसे है।

श्राद्ध एक ऐसा कर्म है जिसमें परिवार के दिवंगत व्यक्तियों (मातृकुल और पितृकुल), अपने ईष्ट देवताओं, गुरूओं आदि के प्रति…
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श्राद्ध एक ऐसा कर्म है जिसमें परिवार के दिवंगत व्यक्तियों (मातृकुल और पितृकुल), अपने ईष्ट देवताओं, गुरूओं आदि के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिये किया जाता है। मान्यता है कि हमारी शरीर में मातृ और पितृ दोनों ही कुलों के गुणसूत्र विद्यमान होते हैं। इसलिये अपने दिवंगत जनों के प्रति श्रद्धा प्रकट करना हमारा कर्तव्य बन जाता है। उनकी आत्मा की शांति के लिये प्रति वर्ष भाद्रपद माह की पूर्णिमा से लेकर आश्विन माह की अमावस्या जिसे सर्वपितृ अमावस्या कहते हैं तक किया जाता है। ब्रह्म पुराण के अनुसार पितरों को लक्ष्य कर शास्त्रसम्मत विधि-विधान से श्रद्धापूर्वक जो भी ब्राह्मणों को दिया जाता है वह श्राद्ध कहलाता है।

जानिये, शास्त्र के अनुसार श्राद्ध का अधिकार किसे है:

1. श्राद्ध का पहला अधिकार पिता या माता के बड़े बेटे का होता है.

2. अगर वह नहीं है तो छोटा बेटा श्राद्ध करता है.

3. सभी भाई अलग-अलग रहते हैं तो सभी को अलग-अलग पितरों का श्राद्ध करना चाहिए.

4. पुत्र नहीं है तो पौत्र या प्रपौत्र श्राद्ध कर सकते हैं.

5. पुत्र ना होने पर भाई श्राद्ध कर सकता है.

6. किसी पुरुष की शादी नहीं हुई है तो ऐसी स्थिति में उसका श्राद्ध मां या बहन कर सकती हैं.

7. यदि बेटा नहीं है तो बेटे की पत्नी श्राद्ध कर सकती है.

8. बेटे के अलावा पोता और परपोता भी अपने मृत दादा-दादी, परदादी का श्राद्ध कर सकते हैं.

9. अगर वो नहीं है तो भाई-भतीजे या उनका बेटा भी श्राद्ध कर्म कर सकता है.

10. बेटी के पुत्र को भी श्राद्ध का अधिकार होता है.

11. मातृकुल के पितरों का श्राद्ध भी पुत्रों को करना चाहिए.

12. विधवा स्त्री के कुल में अगर कोई न हो तो वह भी पितरों का श्राद्ध करा सकती है.

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