वृक्ष संतान स्वरूप हैं। विधिवत् वृक्षारोपण करने वाले स्वर्ग का भागी होता है। उसके शरीर में जितने रोम होते हैं , अपने पहले और पीछे की उतनी पीढ़ियों का उद्धार कर देता है। वृक्ष पुत्रहीन पुरुष को पुत्रवान होने का फल देते हैं। जिन्हें किसी कारण वश संतान न हो उन्हें वृक्ष अवश्य लगाना चाहिए। पद्म पुराण के अनुसार वृक्ष अधिदेवता रूप से तीर्थों में जाकर वृक्ष लगाने वाले को पिण्डदान भी कहते हैं।

पीपल का एक भी वृक्ष लगाने पर एक हजार पुत्रों का फल देता है। पीपल का पेड़ लगाने से मनुष्य लक्ष्मीवान होता है तथा रोग नष्ट होते हैं। अशोक का वृक्ष लगाने से मनुष्य शोक रहित होता है, इसमें अप्सराएं निवास करती हैं। पाकड़ का पेड़ लगाने से मनुष्य यज्ञ का फल प्राप्त करता है। नीम का वृक्ष लगाने से आयुवृद्धि होती है तथा भगवान सूर्यदेव प्रसन्न होते हैं। जामुन का वृक्ष कन्या संतति देता है। अनार का वृक्ष पत्नी देता है। पलाश का वृक्ष लगाने से व्यक्ति ब्रह्मतेज प्राप्त करता है। जो मनुष्य बहेड़ा का पेड़ लगाता है वह प्रेत होता है।
अंकोल का वृक्ष लगाने से वंशवृद्धि होती है। बेल के वृक्ष लगाने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं तथा गुलाब से पार्वती देवी प्रसन्न होती हैं। मोगरे के पेड़ में गन्धर्व निवास करते हैं। चंदन का वृक्ष पुण्य देता है तो कटहल का वृक्ष लक्ष्मी देता है। चंपा का वृक्ष सौभाग्य प्रदान करता है तो ताड़ का वृक्ष संतान नष्ट करता है। मौलसिरी से कुल की वृद्धि होती है तो केवड़ा शत्रुओं को नष्ट करता है।
जो लोग वृक्षारोपण करते हैं उन्हें लोक परलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। जो मनुष्य पृथ्वी पर विधिपूर्वक कुआं, बावली, पोखरा आदि खुदवाता है तथा मंदिर, बगीचा आदि बनवाता है , वह शुद्धचित्त होकर ब्रह्माजी के लोक में जाता है और वहां अनेक कल्पों तक दिव्य आनन्द का अनुभव करता है। दो परार्द्ध तक वहां का सुख भोगने के पश्चात् ब्रह्माजी के साथ ही योगबल से श्रीविष्णु के परमपद को प्राप्त होता है।
इसलिए जीवन में वृक्षारोपण अवश्य करें। इससे उत्तम कोई यज्ञ नहीं हैं।