गौरवशाली गोरखा राइफल के कैप्टन पांडे 3 जुलाई 1999 को ही कारगिल युद्ध में शहीद हुए थे. पांडे ने असीम साहस और धैर्य का परिचय दिया था.उन्हें युद्ध में अपने अदम्य साहस और नेतृत्व के लिए परमवीर चक्र का सम्मान दिया गया था.दुश्मन की गोलियां खाकर शहीद होने से पहले कारगिल युद्ध का रुख पलट दिया. खालुबार टॉप पर तिरंगा फहराने से पहले मौत को हावी होने नहीं दिया.
पांडेय का जन्म 25 जून 1975 को उत्तर प्रदेश के सीतापुर ज़िले के रुधा गाँव में हुआ था. उनके पिता का नाम गोपीचन्द्र पांडेय और मां का नाम मोहिनी था, पांडेय की पढ़ाई लखनऊ सैनिक स्कूल हुई इसके बाद पुणे के पास खड़कवासला स्थित राष्ट्रीय रक्षा अकादमी में प्रशिक्षण लिया और 11 गोरखा रायफल्स रेजिमेंट की पहली वाहनी के अधिकारी बने.
पांडे सबसे पहले कश्मीर में तैनाती हुई उन्होंने सियाचिन में भी अपनी सेवाएं दी. सियाचिन से लौट रहे उसी समय कारगिल युद्ध छिड़ा था इसकी पहले सभी कार्य मिले उन्हें बड़ी शिद्दत से पूरा किया था. वह हमेशा आगे बढ़ कर अपने सैनिकों के नेतृत्व करने वालों में से एक रहे.
इसके बाद उन्हें खालोबार चोटी पर कब्जा करने की जिम्मेदारी सौंपी गई. कर्नल राय ने बताया कि खालोबार टॉप रणनीतिक नजरिए से बहुत अहम था. भारतीय सेना जानती थी कि इस पर कब्जा करने से पाकिस्तानी सेना के दूसरे ठिकाने खुद ब खुद कमजोर हो जाएंगे और उन्हें रसद पहुंचाने और वापसी में परेशानी हो जाएगी. खालोबार चोटी पर हमले के लिए गोरखा राइफल्स की दो कंपनियों को चुना गया. कर्नल राय भी इन टुकड़ियों के साथ थे जिसमें पांडे भी शामिल थे.
कैप्टन पांडे शहीद होते होते 24 साल 7 दिन की उम्र में ही अपने देश के लिए शहादत की अनोखी कहानी लिख गए. कैप्टन पांडे के कारनामे ने युद्ध में भारत का पलड़ा भारी कर दिया जिसके बाद भारतीय सेना ने पीछे हटकर नहीं देखा और अंततः कारगिल युद्ध में भारत की ही जीत है. कैप्टन पांडे को मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया.