दुती चंद रोटी के लिए शुरू हुई दौड़ जो ट्रैक पर आई

  भारत की धावक दुती चंद की जिंदगी पर ,पसीने की स्याही से जो लिखते हैं इरादों को, उनके मुक्कद्दर…
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भारत की धावक दुती चंद की जिंदगी पर ,पसीने की स्याही से जो लिखते हैं इरादों को, उनके मुक्कद्दर के सफेद पन्ने कभी कोरे नही होते’. ये पंक्तियां भारत की धावक दुती चंद की जिंदगी पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं उनके जीवन के कई ऐसे किस्से हैं जो हमारी आंखों को नम कर जाते हैं लेकिन इस नमी की खास बात यही है कि इससे आपका सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है.

इस एथलीट ने केवल 25 साल की उम्र में सारी चुनौतियों का सामना करके कई इतिहास दर्ज किए हैं. जिनकी संघर्ष की कहानी मिसाल हैउन तमाम लोगों के लिए जो हालात से समझौता कर लेते हैं.इन दिनों दुती चंद इसलिए चर्चा में है क्योंकि उन्होंने टोक्यो ओलिंपिक के लिए क्वालीफाई कर लिया है.भारत को देश की इस बेटी से काफी उम्मीदे हैं.

आइए जानते हैं दुती चंद की जिंदगी के कुछ अनसुने किस्से ओडिशा के जाजपुर में एक बेहद गरीब परिवार में दुती चंद का जन्म हुआ था. पिता कपड़ा बुनने का काम करते थे और बड़े परिवार का बामुश्किल पाल पाना होता था एक इंटरव्यू में दुती ने बताया था कि उन्होंने अपनी पहली रेस ही रोटी के लिए लगाई थी. दुती ने जब दौड़ना शुरू किया तो उनके पास न तो दौड़ने के लिए कोई मैदान, न जूते नदी के किनारे रेत में वो नंगे पांव दौड़ लगाती थीं.लेकिन दुती बताती हैं कि उनको दौड़ने का जुनून था और ये जूनून हर दिन बढ़ता ही गया और लोगों की नजर में धीरे-धीरे उनकी आने लगी और सफलता दुती की नई पहचान बनती गई.

दुती ने दौड़ना शुरू किया तो लोग उन्हें ताना मारते थे कि ये भला क्या दौड़ेगी. दुती ने कहा कि लोग कहते थे कि तुम दौड़ोगी तो तुम्हारे पीछे केवल कुत्ते दौड़ेंगे. लोगो ये ताने दुती टूटने नहीं दिया बल्कि उसे हमेशा हिम्मत देते थे कुछ कर जाने की. हुआ भी वही आज दुती जब दौड़ती हैं तो उनके साथ देश का अभिमान और करोड़ों लोगों की उम्मीदें दौड़ रही होती हैं. शायद सच ही है कि कुछ बातों का जवाब तुरंत नहीं देना चाहिए, कुछ बातें होती हैं जिनका जवाब वक्त दे देता है.

दुती को निजी जीवन के अंदर भी कई लड़ाई लड़नी पड़ी.जब उन्होंने अपने समलैंगिक होने की बात स्वीकारी तब उनके अपनों ने भी उनका तब साथ नहीं दिया उसपर उन्होंने बेबाकी से बोला था. एक मशहूर कहावत है इजहार-ए-इश्क से लगता था डरयानि कि जब तक इजहार-ए-इश्क नहीं होता तब तक इश्क परवान नहीं चढ़ता. ये दिक्कत दुती की जिंदगी में भी रही. दुती उस लड़की से प्यार करती थी, लेकिन कभी इश्क का इजहार नहीं कर सकी क्योंकि उन्हें अंजाम से डर लगता था. लेकिन जब उन्हें ये पता चल गया कि वो लड़की भी उनसे प्यार करती है तो फिर दुती का इश्क परवान चढ़कर बोला.दुती ने फिर किसी की नहीं सुनी, सुनी तो बस अपने दिल की. आज वो अपने समलैंगिक रिश्ते पर खुलकर बोलती हैं.

कुल मिलाकर दुती की जिंदगी संघर्ष की मिसाल है और वो देश की करोड़ों बेटियों को हौसला देती हैं कि सपने अगर आंखों में हैं तो उनके लिए दौड़ो आपको जीतने से कोई रोक नहीं सकता.

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