आजादी के 78 वर्षों का लंबा इंतजार और ऐतिहासिक विजय
छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग के लिए 26 जनवरी 2026 की सुबह एक नया इतिहास लेकर आई। देश की आजादी के दशकों बाद, सुदूर दक्षिण बस्तर की कर्रेगुट्टा पहाड़ियों और आसपास के 47 दुर्गम गांवों में पहली बार आधिकारिक रूप से तिरंगा फहराया गया। यह क्षेत्र वर्षों से लाल आतंक और नक्सली विचारधारा के साये में दबा हुआ था, जहाँ कभी लोकतंत्र की आवाज़ पहुंचना नामुमकिन माना जाता था। लेकिन सुरक्षा बलों के अदम्य साहस और प्रशासन की दृढ़ इच्छाशक्ति ने इस अभेद्य किले को भेद दिया। जब ऊंची पहाड़ी की चोटी पर राष्ट्रध्वज लहराया, तो यह केवल कपड़े का टुकड़ा नहीं, बल्कि उन हजारों ग्रामीणों की मुक्ति का संदेश था जिन्होंने पीढ़ियों से केवल भय का शासन देखा था।
कर्रेगुट्टा पहाड़ी: सामरिक जीत और सुरक्षा बलों का शौर्य
कर्रेगुट्टा पहाड़ी सामरिक रूप से नक्सलियों का सबसे सुरक्षित गढ़ माना जाता था। यहाँ से वे सुरक्षा बलों की आवाजाही पर नज़र रखते थे और हिंसक गतिविधियों की योजना बनाते थे। सुरक्षा बलों ने ‘ऑपरेशन कगार’ के तहत इस दुर्गम इलाके को नक्सलियों के चंगुल से मुक्त कराया। इस गणतंत्र दिवस पर सुरक्षा बलों के जवानों ने ग्रामीणों के साथ मिलकर पहाड़ी की सबसे ऊंची चोटी पर तिरंगा स्थापित किया। यह जीत सुरक्षा बलों के उस समर्पण को दर्शाती है, जिसके कारण आज बस्तर के सबसे संवेदनशील इलाकों में भी संविधान की सर्वोच्चता स्थापित हो पा रही है। इस सफल अभियान ने नक्सलियों के मनोबल को पूरी तरह तोड़ दिया है और सुरक्षा का नया घेरा तैयार किया है।
47 दुर्गम गांवों में लोकतंत्र की नई किरण
इस ऐतिहासिक घटना का सबसे भावुक पहलू उन 47 गांवों में तिरंगे का पहुंचना है, जहाँ आज तक किसी सरकारी प्रतिनिधि ने कदम नहीं रखा था। इन गांवों के बच्चों ने पहली बार अपने स्कूलों और सामुदायिक केंद्रों पर ‘जन-गण-मन’ का गान सुना। दशकों से नक्सली इन इलाकों में समानांतर सरकार चला रहे थे और ग्रामीणों को मुख्यधारा से कटने के लिए मजबूर करते थे। गणतंत्र दिवस के इस अवसर पर प्रशासन ने न केवल झंडा फहराया, बल्कि विकास की गारंटी भी दी। इन गांवों में तिरंगे का लहराना इस बात का प्रमाण है कि विकास और लोकतंत्र की जड़ें अब बस्तर के उन कोनों तक पहुंच गई हैं, जिन्हें कभी ‘नो गो ज़ोन’ माना जाता था।
लाल आतंक पर भारी पड़ा तिरंगे का सम्मान
बस्तर में दशकों से चल रहे नक्सलवाद के खिलाफ यह एक बड़ी वैचारिक जीत है। नक्सली अक्सर राष्ट्रीय त्योहारों का बहिष्कार करते थे और काले झंडे फहराकर दहशत फैलाते थे। लेकिन इस बार तस्वीर बदली हुई थी; ग्रामीणों ने स्वयं आगे आकर तिरंगा थाम लिया। यह बदलाव दर्शाता है कि बस्तर की जनता अब हिंसा और डर के साये से बाहर निकलकर शांति और उन्नति का मार्ग चुन चुकी है। कर्रेगुट्टा पहाड़ी पर फहराता तिरंगा नक्सलियों के लिए एक कड़ा संदेश है कि अब उनकी बंदूकों की आवाज़ लोकतंत्र के ढोल-नगाड़ों के सामने फीकी पड़ चुकी है। यह जीत बस्तर को ‘लाल गलियारे’ से मुक्त कर ‘विकास के गलियारे’ में बदलने की दिशा में मील का पत्थर है।
विकास की बयार: बुनियादी सुविधाओं का होगा विस्तार
तिरंगा फहराने के साथ ही प्रशासन ने इन 47 गांवों के लिए विशेष विकास पैकेज की घोषणा की है। सड़क, बिजली, शुद्ध पेयजल और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं अब इन सुदूर पहाड़ियों तक पहुंचाई जाएंगी। सरकार का लक्ष्य है कि ‘नियाद नेल्लानार’ (आपका अच्छा गांव) योजना के तहत इन क्षेत्रों में पुलिस कैंपों के साथ-साथ राशन की दुकानें और स्वास्थ्य केंद्र भी खोले जाएं। कर्रेगुट्टा पहाड़ी पर तिरंगा फहराने का मतलब है कि अब विकास की मशीनें यहाँ बिना किसी डर के काम कर सकेंगी। जब सड़कें इन गांवों को शहरों से जोड़ेंगी, तो यहाँ के युवाओं के पास बंदूकों की जगह रोजगार के अवसर और उज्ज्वल भविष्य की संभावनाएं होंगी।
बस्तर के भविष्य के लिए एक नई उम्मीद
77वें गणतंत्र दिवस पर बस्तर से आई यह खबर पूरे भारत के लिए गौरव का विषय है। यह घटना साबित करती है कि भारत की एकता और अखंडता को कोई भी शक्ति चुनौती नहीं दे सकती। कर्रेगुट्टा और उन 47 गांवों के लोगों के चेहरे पर खिली मुस्कान इस बात की तस्दीक करती है कि वे अब खुद को सुरक्षित महसूस कर रहे हैं। आने वाले समय में यह क्षेत्र पर्यटन और सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाएगा, न कि संघर्ष के लिए। गणतंत्र दिवस 2026 बस्तर के इतिहास में उस दिन के रूप में याद किया जाएगा जब लोकतंत्र ने पहाड़ियों की दुर्गम ऊंचाइयों पर अपनी स्थायी उपस्थिति दर्ज कराई और नफरत के काले बादलों को हटाकर राष्ट्रवाद का सूरज उगाया।