शिवाजी महाराज के किलों में पुणे का लाल महल बहुत महत्त्वपूर्ण था। उन्होंने बचपन में बहुत सा समय वहाँ बिताया था।पश्चिमी भारतीय राज्य महाराष्ट्र के पुणे शहर में स्थित एक ऐतिहासिक महल है। यह महल छत्रपति शिवाजी महाराज के साथ अपने जुड़ाव के लिए प्रसिद्ध है।
लाल महल मूल रूप से शिवाजी के पिता शाहजी भोसले द्वारा 1630 ईस्वी में बनवाया गया था। शिवाजी का जन्म 1630 ईस्वी में महल में हुआ था, और वह 1645 ईस्वी में तोरना किले पर कब्जा करने तक वहीं रहे थे। तोरणा किले पर कब्जा करने के बाद, शिवाजी रायगढ़ चले गए, और लाल महल को कई वर्षों तक उपेक्षा की स्थिति में छोड़ दिया गया।
17वीं शताब्दी के अंत में, शिवाजी की मां जीजाबाई और उनकी पत्नी महारानी सईबाई ने लाल महल का पुनर्निर्माण किया था। महल का उपयोग शिवाजी के सैनिकों के लिए एक सैन्य प्रशिक्षण केंद्र के रूप में भी किया जाता था।
आज, लाल महल पुणे में एक लोकप्रिय पर्यटक आकर्षण है, और इसमें एक संग्रहालय है जो शिवाजी के जीवन और मुगल साम्राज्य के खिलाफ स्वतंत्रता के लिए उनकी लड़ाई से संबंधित प्रदर्शित करता है। संग्रहालय शिवाजी और उनके सैनिकों द्वारा उपयोग की जाने वाली विभिन्न कलाकृतियों, हथियारों और कवचों के साथ-साथ चित्रों और अन्य ऐतिहासिक वस्तुओं को प्रदर्शित करता है। महल में एक सुंदर बगीचा और शिवाजी महाराज की एक मूर्ति भी है, जो इसे महाराष्ट्र के इतिहास और संस्कृति का एक महत्वपूर्ण स्थल बनाती है।
उस समय शिवाजी महाराज के लाल महल पर औरंगजेब के मामा शाइस्ता खाँ का कब्जा था। उसके एक लाख सैनिक महल में अन्दर और बाहर तैनात थे; पर शिवाजी महाराज ने भी संकटों से हार मानना नहीं सीखा था। और इस अपमान का बदला लेनेे का संकल्प लिया ।6 अप्रैल, 1663 (चैत्र शुक्ल 8) की मध्यरात्रि का मुहूर्त इसके लिए निश्चित किया गया। उन दिनों मुसलमानों के रोजे चल रहे थे। दिन में तो बेचारे कुछ खा नहीं सकते थे; पर रात में खाने-पीने और फिर सुस्ताने के अतिरिक्त कुछ काम न था। शिवा राजे ने इसी समय हमला करने की सोचा । हर बार की तरह इस बार भी अभियान के लिए सर्वश्रेष्ठ साथियों का चयन किया गया।
तीन टोलियों में सब वीर चले। शाइस्ता खाँ की सेना में मराठे हिन्दू भी बहुत थे। अतः पहरेदारों को शक नहीं हुआ। द्वार खोलकर उन्हें अन्दर जाने दिया गया। महाराज शिवाजी तो महल के कोने कोने को जानते थे ही। दीवार के उस पार जनानखाना था। वहाँ शाइस्ता खाँ अपनी बेगमों और रखैलों के बीच बेसुध सो रहा था। शिवा राजे के साथियों ने वह दीवार गिरानी शुरू की। दो-चार ईंटों के गिरते ही हड़कम्प मच गया। एक नौकर ने भागकर खाँ साहब को दुश्मनों के आने की खबर की। दीवार तोड़कर पूरा दल जनानखाने में आ घुसा। औरतें चीखने-चिल्लाने लगीं। सब ओर हाय-तौबा मच गयी। एक मराठा सैनिक ने नगाड़ा बजा दिया। इससे महल में खलबली मच गयी। चारों ओर ‘शिवाजी आया, शिवाजी आया’ का शोर मच गया।
शिवाजी महाराज को तो शाइस्ता खाँ से बदला लेना था। उन्होंने तलवार के वार से पर्दा फाड़ दिया। सामने ही खान अपनी बीवियों के बीच घिरा बैठा काँप रहा था। एक बीवी ने समझदारी दिखाते हुए दीपक बुझा दिया। खान ने आव देखा न ताव, बीवियों को छोड़ वह खिड़की से नीचे कूद पड़ा; पर तब तक शिवाजी राजे की तलवार चल चुकी थी। उसकी तीन उँगलियाँ कट गयीं। अंधेरे के कारण शिवाजी महाराज समझे कि खान मारा गया। अतः उन्होंने सबको लौटने का संकेत कर दिया। इसी बीच एक मराठे ने मुख्य द्वार खोल दिया। शिवाजी महाराज और उनके साथी भी मारो-काटो का शोर मचाते हुए लौट गये। अब खान की वहाँ एक दिन भी रुकने की हिम्मत नहीं हुई। वह गिरे हुए मनोबल के साथ औरंगजेब के पास गया। औरंगजेब ने उसे सजा देकर बंगाल भेज दिया।