आज गोदान और गबन समेत कई मशहूर उपन्यास लिखने वाले मुंशी प्रेमचंद की पुण्यतिथि है. उनकी रचनाओं को समाज का दर्पण माना जाता है. 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के लमही गांव में जन्मे धनपत राय को ही प्रेमचंद और उपन्यास सम्राट के नाम से जाना जाता है. उनकी कही बहुत सी बातें आज के दौर के लोग भी बहुत आसानी से समझ जाते हैं.
लेखन में आगमन -प्रेमचंद ने दसवीं पास करने के बाद बनारस के केंद्रीय हिंदू कॉलेज में प्रवेश लेना चाहा। परंतु, वहां की अंकगणित उन्हें समझ नहीं आई और बाद में उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी।
पढ़ाई छोड़ने के बाद उन्होंने अध्यापन का कार्य शुरू किया जिसके लिए उन्हें 18 प्रति महीने की सैलरी पर रखा गया। बनारस के एक वकील के बेटे को पढ़ाने के लिए उन्हें 5 प्रति महीना मिला करता था। 1900 में प्रेमचंद ने गवर्नमेंट डिस्ट्रिक्ट स्कूल में एक असिस्टेंट टीचर की जॉब प्राप्त की। इस जॉब के लिए उन्हें 20 प्रति महीना मिला करता था।
अध्यापन कार्य के दौरान उन्हें काफी सारा समय मिल जाया करता था जिसमें उन्होंने लेखन कार्य को शुरू किया।
प्रेमचंद ने अपना पहला उपन्यास देवस्थान रहस्य लिखा और उपन्यास में अपने आप को नवाब राय नाम दिया। जिसकी वजह से उन्हें मुंशी प्रेमचंद के अलावा नवाब राय के नाम से भी जाना जाता है।
प्रेमचंद की मृत्यु (Death of Premchand)
प्रेमचंद ने अपने अध्यापन कार्य को छोड़ दिया और 18 मार्च 1921 को बनारस चले आए। अपनी जॉब छोड़ने के बाद उन्होंने सिर्फ साहित्य कार्य पर ध्यान दिया। जॉब छोड़ने के बाद उनकी आर्थिक स्थिति भी खराब होने लग गई।
उन्होंने भारत के असहयोग आंदोलन में साथ देने के लिए महात्मा गांधी के कहने पर ब्रिटिश सरकार की जॉब छोड़ दी। 8 अक्टूबर 1936 को मुंशी प्रेमचंद की बनारस में मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी ने भी उनके ऊपर एक पुस्तक लिखी जिसका नाम था – प्रेमचंद घर में ।
प्रसिद्ध कथन
चापलूसी का ज़हरीला प्याला आपको तब तक नुकसान नहीं पहुंचा सकता जब तक कि आपके कान उसे अमृत समझ कर पी न जाएं.
महान व्यक्ति महत्वाकांक्षा के प्रेम से बहुत अधिक आकर्षित होते हैं.”
दौलत से आदमी को जो सम्मान मिलता है, वह उसका नहीं, उसकी दौलत का सम्मान है.”
जिस प्रकार नेत्रहीन के लिए दर्पण बेकार है उसी प्रकार बुद्धिहीन के लिए विद्या बेकार है.”
संसार के सारे नाते स्नेह के नाते हैं, जहां स्नेह नहीं वहां कुछ नहीं है.”
स्वार्थ की माया अत्यन्त प्रबल है.