कैसी भी दुःखदायक और विषम परिस्थिति क्यों न आ जाए , “उत्साह” सदैव हमारा सहायक सिद्ध होगा । संसार के इतिहास में जितने अमर महापुरुष हुए हैं उनमें अपनी – अपनी तरह के धार्मिक, राजनैतिक, समाज सुधारक कैसी ही गुण और विशेषताएँ धारण किये रहे हों, पर एक जो सब में समान रूप से दिखाई देता है, वह है “उत्साह” । “उत्साह” का अर्थ है अपनी मान्यताओं के प्रति दृढ़ता । हम जो कहते हैं, उसको कितने अंशों में पूरा कर सकते हैं, इससे उस कार्य के प्रति अपना विश्वास प्रकट होता है और उसी के अनुरूप प्रभाव भी उत्पन्न होता है । “उत्साह” कहने की नहीं, करने की शैली का नाम है ।
हम किस तरह उत्साही बनें, यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है । किसी को भाग्यवश, धन या साधनों के बदले इस महान गुण की उपलब्धि होती हो, यह तो संभव दिखाई नहीं देता । ऐसा रहा होता तो वह कुछ व्यक्तियों की ही विरासत रही होती । सीमित शक्ति, सामर्थ्य और साधनों वाले व्यक्ति भी अपने अंतर का “उत्साह” जगा सकते हैं । मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि वह मानवीय व्यक्तित्व का सहज गुण है, जिसे प्रयत्न और परिस्थितियों द्वारा जगाया जा सकता है ।
मान लीजिए एक कक्षा में दो विद्यार्थी परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो जाते हैं । यह घटना दोनों के लिए समान है । एक इस घटना से निराश होकर के पढ़ाई छोड़कर घर बैठ जाता है और सामान्य श्रेणी का जीवन जीने लगता है । दूसरे का उत्साह ठंडा नहीं हुआ । उसने परिस्थितियों का मुकाबला किया और दूसरे वर्ष फिर पढ़ाई में लग गया । कठिनाइयाँ जरूर आई पर अंततः उसको सफलता मिल गई और वह अच्छी नौकरी पाने के योग्य हो गया । “प्रयत्न” और “परिस्थितियों” ने दो व्यक्तियों के जीवन में इतना अंतर ला दिया । ऐसी अनेक घटनायें व्यावहारिक जीवन में रोज ही सामने आती है ।