सूरदास को गुनकर, सुनकर और पढ़कर हम बड़े हुए. स्कूल की किताबों में भी पढ़ा, घर की पूजा अर्चना में भी सुना और दोहराया. शरीर की आंखों से वह बाहर की दुनिया न देख सकते थे, लेकिन उनकी आत्मा की नज़र ने प्रेम और भक्ति की पराकाष्ठा को महसूस कर ऐसा काव्य रचा जो अद्भुत है. मूल रूप से कृष्ण के इर्द गिर्द रची उनकी रचनाओं में कभी सगुण भक्ति धारा दीखती है और कभी सगुण के मार्फत निर्गुण. लेकिन ईश्वर से प्रेम करने वाले के लिए क्या सगुण और क्या निर्गुण.. दोनों रास्ते ही तो हैं, ईष्ट तक पहुंचने के. दोनों की मंजिल है, परमात्मा से मिलाप. न्यूज18 हिन्दी के स्पेशल पॉडकास्ट में आपका स्वागत है. स्वीकार करिए पूजा प्रसाद का नमस्कार. 16वीं सदी के महान रचनाकार संत सूरदास के तीन भजन हम गद्य रूप में आपके सामने पेश करेंगे.
अवगुण चित ना धरो- प्रभु मेरे अवगुण चित ना धरो
समदर्शी प्रभु नाम तिहारो, चाहो तो पार करोएक लोहा पूजा मे राखत, एक घर बधिक परो |
सो दुविधा पारस नहीं देखत, कंचन करत खरो ||
प्रभु मेरे अवगुण चित ना धरो….एक नदिया एक नाल कहावत, मैलो नीर भरो |
जब मिलिके दोऊ एक बरन भये, सुरसरी नाम परो ||
प्रभु मेरे अवगुण चित ना धरो…एक माया एक ब्रह्म कहावत, सुर श्याम झगरो |
अब की बेर मुझे पार उतारो, नही पन जात तरो ||
प्रभु मेरे अवगुण चित ना धरो….प्रभु मेरे अवगुण चित ना धरो
समदर्शी प्रभु नाम तिहारो, चाहो तो पार करोकहा जाता है कि सूरदास के गुरु थे संत वल्लभाचार्य महाप्रभु. वल्लभाचार्य को विष्णुस्वामी भी कहा जाता है. उन्होंने उत्तर प्रदेश के ब्रज में कृष्ण भक्ति पर केंद्रित पुष्टिमार्ग (PushtiMarg sect) मत की शुरुआत की थी. सूरदास का लिखा सूरसागर, सूर-सारावली, साहित्य लहरी में दर्ज है. भक्तिकाल में जन्मे सूरदास की रचनाएं ब्रज बोली में ही हैं.
इस्मत चुगताई की कहानी: ‘दो हाथ’
तुम मेरी राखो लाज हरि
तुम मेरी राखो लाज हरि
तुम जानत सब अन्तर्याम
करनी कछु ना करी
तुम मेरी राखो लाज हरि
अवगुन मोसे बिसरत नाहिं
पलछिन घरी घरी
सब प्रपंच की पोट बाँधि कै
अपने सीस धरी
तुम मेरी राखो लाज हरि
दारा सुत धन मोह लिये हौं
सुध-बुध सब बिसरी
सूर पतित को बेगि उबारो
अब मोरि नाव भरी
तुम मेरी राखो लाज हरि
सूरदास से जुड़ा एक विवाद यह है कि कुछ लोग उनके जन्म से देख न सकने की बात को स्वीकारते नहीं हैं. वैसे सूरदास ने खुद को जन्म से अंधा बताया है लेकिन यह भी हो सकता है कि यह प्रतीकात्मक रूप में कहा हो! बहरहाल, जानकारों का तर्क है कि विष्णु के अवतार कहे जाने वाले कृष्ण की लीला व गोपियों का वर्णन जिस प्रकार उन्होंने किया है, उससे ऐसा मानना मुश्किल है. खैर, हम आगे बढ़ते हैं, उनकी अगली रचना की ओर… अब की बेर उबारो
तुम नाथन के नाथ स्वामी
दाता नाम तिहारो
कर्महीन जनम को अंधो, मोह ते कौन नकारो
नाथ मोहे अब की बेर उबारो
अबकी बेर उबारो
तीन लोक के तुम प्रतिपालक
मैं हूँ दास तिहारो
तारी जाति कुजाति श्याम तुम
मोह पर किरपा धारो, धारो
अब की बेर उबारो …
नाथ मोहे अब की बेर उबारो
अबकी बेर उबारो
क्षुद्र पतित तुम तारे रमापति
अब ना करो जिया डारो
सूरदास साचो तब माने -२
जो है मम निस टारो, निस टारो
अबकी बेर उबारो…
नाथ मोहे अब की बेर उबारो
अबकी बेर उबारो
इश्क मजाज़ी से इश्क हक़ीक़ी तक का सफर इंतहा प्रेम के रास्ते से गुजरता है. महसूस होता है कि इस रास्ते को सूरदास से बेहतर कम ही संत कवि पहचान पाए होंगे. चलिए फिर मुलाकात होती है आपसे, एक और रचनाकार के साथ, तब तक के लिए पूजा प्रसाद को दें विदा. नमस्कार.