Kargil Vijay Diwas- कारगिल युद्ध में क्या थी कूटनीति की भूमिका?”

1999 में भारत और पाकिस्तान (India Pakistan) के बीच हुआ युद्ध पिछले तीन युद्ध से बहुत ही अलग था. इस…
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1999 में भारत और पाकिस्तान (India Pakistan) के बीच हुआ युद्ध पिछले तीन युद्ध से बहुत ही अलग था. इस युद्ध में पाकिस्तान ने सीधे तौर पर इसे युद्ध माना ही नहीं था, इसमें घुसपैठ के जरिए भारत के कारगिल (Kargil) और उसके आसपास के इलाकों पर कब्जा करने का प्रयास किया था. इस युद्ध में अंतिम जीत भारत की थी, लेकिन इसमें घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय कूटनीति (Indian Diplomacy) की भी एक बड़ी भूमिका था.

आखिर भारत की कौन सी ऐसी नीति थी जिससे उसे इस युद्ध के मामले में अंतरराष्ट्रीय समर्थन हासिल हुआ और वह पाकिस्तान को अलग थलग करने में सफल हो कर उसे हरा सका.

लाइन ऑफ कंट्रोल बदलने की कोशिश- कश्मीर में कारगिल के इलाके में लाइन ऑफ कंट्रोल जो 1971 के युद्ध के समय से दोनों देशों के बीच की अंतरिम सीमा की तरह ही मानी जाती रही है. लेकिन पाकिस्तान ने 1999 में योजनाबद्ध तरीके से इसमें घुसपैठ कराई और इस एलओसी को बदलने की कोशिश की. मई 1999 के तीसरे सप्ताह में ही तय हो गया था कि भारत को इन घुसपैठियों का सफाया करने के लिए सैन्य कार्रवाई करनी होगी.

अंतरराष्ट्रीय और घरेलू दोनों ही स्तर पर-सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि इस कार्रवाई को इस तरह से अंजाम देने की जरूरत थी कि वह वैधानिक तो लगे ही और उसके साथ ही उसे अंतरराष्ट्रीय और घरेलू दोनों ही स्तर पर पूरा समर्थन मिल सके. इसीलिए यह युद्ध भारत के लिए कूटनीति ओर सेना के उपयोग दोनों का ही सफल मिश्रण साबित हुआ. जहां घरेलू स्तर पर लोगों को साथ लेने के प्रिया टीवी और अन्य प्रचार साधनों का उपयोग किया तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया कि वह पाकिस्तान के आक्रमण का शिकार है और जो भी कदम उठा रहा है आत्मरक्षा में उठा रहा है.

साख को मजबूत बनाने की जरूरत-इसके अलावा 1998 में भारत के परमाणु परीक्षणों के बाद भारत अंतरराष्ट्रीय समुदाय में अपनी साख को और कमजोर नहीं करना चाहता था. लेकिन आज  कारगिल युद्ध को भारत की कूटनीति और सैन्य सफलता की बानगी कहा जाता है. इसमें लोगों को पूरी तरह से विश्वास में लेने के साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी दुनिया को भारत का पक्ष समझाया गया जिससे बहुत सारे देश भारत के साथ खड़े हो गए.”

भारत का पहला टेलीविजन युद्ध-कारगिल युद्ध वास्तव में भारत का पहला टेलीविजन युद्ध था.  पहली बार टीवी के पत्रकार युद्ध के इलाके से रिपोर्टिंग करते दिखाई दिए  और उनकी तस्वीरें टीवी पर हर समय छाई रहीं. इससे भारत के पक्ष में एक जनमत बना और दुनिया के लोगो को भी भारत के पक्ष में लाए में मदद मिली. इसके अलावा रक्तदान के शिविरों, सेना के लिए वेलफेयर फंड और सेलिब्रिटी समुदाय ने भी खुले दिल से देश के सैनिकों को सहायता और अनुदान दिए. इससे भारतीय सैनिकों का भी मनोबल काफी बढ़ा.”

मीडिया मैनेजमेंट-भारत सरकार ने भी मीडिया को योजनाबद्ध तरीके से मैनेज किया और रक्षा मंत्रालय की ओर से नियमित ब्रीफींग की जिसे भारत की थलसेना, वायुसेना और विदेशमंत्रालय के प्रवक्ताओं ने संचालित किया. इसमें किसी भी तरह के राजनैतिक  रूप नहीं था. इसके बाद भी भारत केपाकिस्तानी मीडिया और प्रमुख पाकिस्तानी मीडिया पर रोक लगाने से पाकिस्तान को यह कहने का मौका मिला कि भारत सच को छिपा रहा है. लेकिन यह पाकिस्तान के ये प्रयास सफल नहीं हुए.

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति-लेकिन कारगिल युद्ध में सहसे अहम पहलू भारत की अंतरराष्ट्रीय कूटनीति थी. 1998 में परमाणु परीक्षण के बाद भारत पर पहलो से प्रतिबंध लगे हुए थे. इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए भारत ने कुछ फैसलों का ऐलान किया है.पहला यह कि भारत लाइन ऑफ कंट्रोल को पार नहीं करेगा. इसके साथ भारत ने यह भी तय किया है कि भारत पाक सीमा के किसी दूसरे हिस्से पर मोर्चा खोल कर इस युद्ध को बड़ा रूप नहीं देगा.

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