वैसे तो मेघालय का मौसिनराम ऐसी जगह है, जिसे दुनिया में सबसे ज्यादा बारिश वाली जगह माना जाता है. इस जगह ने एक नया रिकॉर्ड बना दिया. यहां गुरुवार यानि 16 जून को सुबह 08.30 बजे जो मूसलाधार बारिश शुरू हुई तो ये अगले दिन सुबह 08.30 बजे तक चलती रही. ये बारिश इतनी जबरदस्त थी कि केवल 24 घंटे में 1003.6 मिलीमीटर बारिश हो गई. इससे पहले देश में एक दिन में इससे भी जबरदस्त बारिश 1563.3 मिलीलीटर चेरापूंजी में 16 जून 1995 में हुई थी.मासिनराम में 07 जून 1966 को एक दिन में 945.4 मिलीलीटर बारिश हुई थी, जो इससे पहले वहां हुई सबसे ज्यादा एक दिन में हुई बारिश थी. ये जगह चेरापूंजी के बगल में ही है.
ये सोचने वाली बात है कि जहां इतनी बारिश होती हो, वहां लोग कैसे रहते होंगे.दुनिया में सबसे ज्यादा नमी वाले जगह के तौर पर गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में मेघालय के मौसिनराम का नाम दर्ज है. यहां बंगाल की खाड़ी की वजह से काफी नमी है. साथ ही यहां औसतन सालाना बारिश 11,871 मिलीमीटर होती है. लेकिन इसकी 10 फीसदी बारिश 16 जून को ही हो गई
सालभर में यहां जितनी बारिश होती है वो इतनी है कि रियो डि जेनेरियो स्थित क्राइस्ट की 30 मीटर ऊंचे स्टेच्यू के घुटनों तक पानी आ जाएगा. चेरापूंजी की जगह अब उसी से लगभग 15 किलोमीटर दूर बसा मासिनराम ले चुका है. गिनीज बुक में दर्ज है कि साल 1985 में मासिनराम में 26,000 मिलीमीटर बारिश हुई थी जो अपने आप में एक रिकॉर्ड रहा.
कहां है चेरापूंजी की जगह- चेरापूंजी, जिसे स्थानीय लोग सोहरा के नाम से भी पुकारते हैं, वहां मौसिनराम की तुलना में 100 मिलीमीटर कम बारिश होती है. इस तरह यह दुनिया का दूसरा सबसे अधिक बारिश वाला गांव है. दरअसल अगर हम इतिहास में जाकर सबसे अधिक हुई बारिश की बात करें तो उसमें अभी भी चेरापूंजी पहले नंबर पर है. साल 2014 के अगस्त महीने में चेरापूंजी में 26,470 मिलीमीटर की बारिश हुई थी जो मासिनराम से अधिक था. लेकिन अगर हम साल भर का औसत निकालें तो बहुत कम अंतर से ही सही लेकिन मासिनराम दुनिया का सबसे अधिक बारिश वाला स्थान माना जा सकता है.
टक्कर देने वाली कई दूसरी जगहें भी हैं- मेघालय के मौसिनराम और चेरापूंजी के अलावा कोलंबिया के दो ऐसे गांव हैं जो सबसे अधिक बारिश के मामले में इन्हें टक्कर देते हैं. उत्तर पश्चिमी कोलंबिया के शहर लाइओरो और लोपेज डे मिसी ये दो शहर हैं जहां साल भर बारिश होती है. साल 1952 और 1954 के बीच में यहां सालाना 13,473 मिलीमीटर बारिश हुई थी जो मौसिनराम की औसत बारिश से अधिक है. लेकिन मौसमविदों का मनाना है कि उस समय बारिश को मापने के जो पैमाने प्रयोग किए जाते थे उनको अब नकार दिया गया है.
साथ ही कोलंबिया के इन गांवों की बारिश का कई सालों का रिकॉर्ड भी अब खो चुके हैं. अब पिछले 30 सालों के डेटा के आधार पर भारत के मेघालय में स्थित यह दोनों गांव ही पहले और दूसरे नंबर पर आते हैं. तब भी कोलंबियाई जगहों पर सालाना लगभग 300 दिनों तक बारिश होती रहती है.
कैसा है यहां का जीवन- किसी भी स्थान पर रहने वाले लोगों का जीवन वहां की जलवायु पर बहुत अधिक निर्भर करता है. मौसिनराम और चेरापूंजी में जहां हमेशा मौसम नमी भरा रहता है, लोगों का पहनावा, खान-पान और काम-काज सब कुछ रेगिस्तान में रहने वालों से बिलकुल अलग होते हैं. इन हिस्सों में लगातार बारिश होती रहती है. इस वजह से यहां खेती करने की संभावना नहीं होती. इसीलिए यहां सबकुछ दूसरे गांव और शहरों से आता है. इस सामानों को प्लास्टिक में लपेटकर ड्रायर से सुखाकर बेचा जाता है.
यहां लोग हमेशा अपने साथ बांस से बनी छतरियां रखते हैं. इन्हें कनूप कहा जाता है. काम पर जाने के लिए लोग प्लास्टिक पहनकर जाते हैं. बारिश की वजह से सड़कें बहुत जल्दी खराब हो जाती हैं. इसीलिए लोगों का बहुत सा समय इनकी मरम्मत में ही लग जाता है. जीवन बहुत मुश्किल है और बारिश इसे और मुश्किल बनाती है.
पेड़ों से बनाते हैं पुल-इन परेशानियों के अलाना यहां बने पुल भी हमेशा जर्जर हालात में रहते हैं. यही देखते हुए हर साल स्थानीय लोग पेड़ की जड़ों को बांधकर एक से दूसरे जगह जाने-आने का काम करते हैं. ज्यादातर मजबूती के चलते रबर या बांस के पुल बनाए जाते हैं. ये पानी में जल्दी खराब होते या भार से टूटते नहीं हैं. अगर अच्छी तरह से बनाया जाए तो बांस का पुल लगभग एक दशक चल जाता है. यानी कुल मिलाकर तुलना करें तो मुंबई या बेंगलुरू जैसे शहर जब बारिश में अस्त-व्यस्त हो जाते हैं, तब इन शहरों के तो हाल ही बेहाल होते होंगे.
प्राकृतिक सुंदरता भी गजब की- मौसिनराम अपनी प्राकृतिक सुन्दरता के लिए भी खासा प्रसिद्ध है. वर्षा में यहां ऊंचाई से गिरते पानी के फ़व्वारे और कुहासे जैसे घने बादलों को क़रीब से देखने का अपना ही आनन्द है. मासिनराम के निकट ही मावजिम्बुइन की प्राकृतिक गुफाएं हैं, जो अपने स्टैलैगमाइट के लिये प्रसिद्ध हैं. स्टैलैग्माइट गुफा की छत के टपकाव से फर्श पर जमा हुआ चूने का स्तंभ होता है.
क्यों होती है यहां इतनी बारिश-बंगाल की खाड़ी’ का मानूसन दक्षिणी हिन्द महासागर की स्थायी पवनों की वह शाखा है, जो भूमध्य रेखा को पार करके भारत में पूर्व की ओर प्रवेश करती है. ये मानसून सबसे पहले म्यांमार की अराकान योमा तथा पीगूयोमा पर्वतमालाओं से टकराता है, जिससे यहां उत्तर पूर्व में तेज बारिश होती है. फिर ये मानसूनी हवाएं सीधे उत्तर की दिशा में मुड़कर गंगा के डेल्टा क्षेत्र से होकर खासी पहाड़ियों तक पहुंचती हैं. लगभग 15,00 मीटर की ऊंचाई तक उठकर मेघालय के चेरापूंजी तथा मौसिनराम नामक स्थानों पर घनघोर वर्षा करती हैं.