भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में महात्मा गांधी का बहुत बड़ा योगदान माना जाता है. उनका कद के आसपास कोई नेता नहीं ठहरता दिखता, फिर भी कई ऐसे नेता भी रहे हैं जिन्होंने इस आंदोलन में ऐसे योगदान दिए जिन्होंने ना केवल अपने समय में बल्कि उसके बाद भी बहुत सम्मान पाया है. इनमें सबसे बड़े नामों में प्रमुख है पंडित मदन मोहन मालवीय उन्होंने सम्मान पूर्वक महामना भी कहा जाता है.
आज यानि 12 नवंबर को बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के संस्थापक रहे, महान स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक, पत्रकार और वकील रहे मदन मोहन मालवीय की पुण्यतिथि पर देश उन्हें याद कर रहा है. उनका जन्म इलाहाबाद के एक साधारण परिवार में 25 दिसंबर 1861 को हुआ था. उनके पिता का नाम ब्रजनाथ और मां का नाम भूनादेवी था. शुरुआती शिक्षा इलाहबाद में करने के बाद पंडित जी ने कलकत्ता से यूनिवर्सिटी से बीए की शिक्षा पूरी की. बचपन से ही उन्हें कविता लिखने का शौक था. पत्रिकाओं में उनकी कविताएं मार्कंड नाम से छपा करती थीं.
मदन मोहन मालवीय ने वर्ष 1886 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में उनके संबोधन ने सभी का दिल जीत लिया जिसके बाद उनकी राजनैतिक यात्रा शुरू हुई. इसके बाद आर्थिक सहयोग मिलने पर उन्होंने एक अंग्रेजी दैनिक अखबार शुरू किया. उन्होंने कानून की पढ़ाई पूरी कर इलाहाबाद जिला अदालत में और दो साल के भीतर ही हाई कोर्ट में वकालत शुरू कर दी.
1911 में पंडित जी ने वकालत छोड़ दी जिससे कि वे शिक्षा और समाज सेवा कर सकें. उन्हें सन्यास ले लिया लेकिन देशभक्ति के कार्यों को नहीं छोड़ा. लेकिन फिर भी उन्होंने चौरी चौरा कांड में गिरफ्तार हुए 177 स्वतंत्रता सेनानियों के लिए मुकदमें में वकालत की और उनमें से 156 को छुड़वा लिया जिसमें सभी मौत की सजा के आरोपी बनाए गए थे.
पंडित को महात्मा गांधी बहुत सम्मान देते थे. वे उन्हें अपने बड़े भाई के समान मानते थे. असहयोग आंदोलन के प्रमुख किरदार रहे मालवीय ने कांग्रेस के खिलाफत आंदोलन का समर्थन करने के पक्ष में नहीं थे. वे एकमात्र ऐसे कांग्रेस नेता रहे थे जो आजादी से पहले चार बार कांग्रेस अध्यक्ष रहे थे. उन्हें महामना नाम रवींद्रनाथ टैगोर ने दिया था.
पंडित जी बनारस हिदू कॉलेज सह संस्थापकों में से एक थे. जो जल्दी ही बनारस यूनिवर्सिटी में बदल गया. लेकिन उन्होंने इसके लिए पेशावर से कन्याकुमारी तक जगह जगह जाकर चंदा लिया और एक करोड़ से भी ज्यादा की राशि जुटाई. हैदराबाद के निजाम ने तो गुस्से में उन्हें अपनी जूती देने की पेशकश की, पंडित ने वह जूती ले भी ले और उसने हैदराबाद के बाजार में नीलाम करने भी पहुंच गए. फिर निजाम को अपने गलती का अहसास हुआ और उन्हें पंडित जी को ससम्मान चंदा दिया.
सत्यमेव जयते मंत्र को अपने समय में प्रचारित भी मदन मोहन मालवीय ने ही किया. आजादी के एक साल पहले 12 नवंबर 1946 को उनका निधन हो गया. उनकी हरिद्वार में शुरू की हुई हर की पौड़ी की आरती की परंपरा आज भी जारी है. देश के कई शहरों में मालवीय नगर मिलते हैं. 2014 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया.