बाल गंगाधर तिलक , समाज कल्याण के ,लिए हमेशा, तत्पर रहे

  भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में बाल गंगाधर तिलक का नाम प्रमुख तोर पर लिया जाता है आज भी लोगों की…
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भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में बाल गंगाधर तिलक का नाम प्रमुख तोर पर लिया जाता है आज भी लोगों की जुंबा पर उनके बोलै गया वाक्य, ‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा रहता है बहुमुखी प्रतिभा के धनी तिलक एक  भारतीय राष्ट्रवादी, शिक्षक, वकील  गणितज्ञ समाज सुधारक,  स्वतन्त्रता सेनानी ओजस्वी व्यक्तित्व के  नेता थे,

1अगस्त को देश उनकी 101वीं पुण्यतिथि मना रहा है. आज देश के युवाओं को तिलक के जीवन से प्रेरणा लेने की जरूरत है.बाल गंगाधर तिलक का जन्म 23 जुलाई 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरि के चिखनीन गांव के ब्राह्मण परिवार में हुआ था. तिलक बचपन से ही पढ़ाई में मेधावी थे उन्होंने बी.ए. तथा कानून की परीक्षा पास की थी तिलक ने वकालत को पेशे छोड़कर देश सेवा का रास्ता चुना.

तिलक ने बंबई में अकाल और पुणे में प्लेग की बीमारी के दौरान देश में कई सामाजिक कार्य किए. उन्होंने महाराष्ट्र में सार्वजनिक रूप से वर्ष 1893 में गणेशोत्सव मनाने की शुरुआत की. इसमें गणेश चतुर्थी के दिन लोग नई गणेश मूर्ति घर में 10 दिन तक रखकर उत्सव मनाते थे. तिकल के दिमाग में ये ख्याल आया कीक्यों न गणेशोत्सव को घरों से निकाल कर सार्वजनिक जगहों पर मनाया जाए, ताकि इसमें हर जाति के लोग शामिल हो सखे . तिलक के इस प्रयास में पेश्वाओं की भी सहयोग मिला.

वर्ष 1907 में कांग्रेस गरम दल और नरम दल में बट गई. तिलक गरम दल के प्रमुख नेता बने जिनके साथ लाला लाजपत राय और बिपिन चन्द्र पाल आ गए थे.  इन तीनों को लाल-बाल-पाल के नाम से शोहरत मिली. 1908 में तिलक ने क्रांतिकारी प्रफुल्ल चाकी और खुदीराम बोस के बम हमले का समर्थन किया और उन्हें बर्मा (अब म्यांमार)    में जेल भेज दिया गया.

मांडला जेल के दौरान ही उनकी पत्नी का निधन हुआ तो उन्हें लिखे गए एक खत के जरिए यह जानकारी मिली. उन्हें अपनी पत्नी के अंतिम दर्शन भी देने नहीं दिए गए. जेल में लिखी उनकी किताब गीता रहस्य बहुत लोकप्रिय हुई और उसके बहुत सी भाषाओं में अनुवाद हुए, तिलक ने एनी बेसेंट और मोहम्मद अली जिन्ना की मदद से 1916 में होम   रूल लीग की स्थापना की.

अपने राष्ट्रवादी आंदोलनों की वजह से बाल गंगाधर तिलक को भारतीय राष्ट्रवाद के पिता के रूप में जाना जाता है. 1 अगस्त 1920 को उनकी बम्बई में मृत्यु हो गयी. गान्धी जी ने उन्हें आधुनिक भारत का निर्माता और जवाहरलाल नेहरू ने भारतीय क्रान्ति का जनक बताया था.

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