पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने अपने कार्यकाल कई ऐतिहासिक फैसले किए जिससे देश गरीबी से उबर सखे बता दें कि वो ऐसा दौर था, जब देश को अपना सोना तक विदेशों में गिरवी रखना पड़ा था. उनके समय को आर्थिक उदारीकरण के लिए याद किया जाता है. लेकिन साथ ही उस दौर के साथ घोटालों की लंबी फेहरिस्त भी याद आती है.उन्हें देश में आर्थिक सुधारों के लिए बड़ा श्रेय दिया जाता है प्रधानमंत्री राव ने इसके बाद देसी बाजार को खोल दिया था और उस समय आलोचना का शिकार हुआ लेकिन आज हम जिसकी बदौलत टॉप देशों में हैं. ये तो हुआ राजनैतिक पहलू लेकिन इसका फर्क आम आदमी पर भी था. निजी नौकरियां तो थी ही नहीं और
नरसिम्हा राव उस समय प्रधानमंत्री बने जब पढ़े-लिखे लोग भी बेरोजगार रहते.कंपनियां कम थीं ,सरकारी ऑफिस में काम मिल गया तो मिल गया,लाइसेंस मिलता और न ही बैंक लोन देने को तैयार रहते. और साल 1991 की मई में तत्कालीन पीएम राजीव गांधी की एक बम विस्फोट में निधन हो गया. उनके पद कोण शंभलेगाइस बात पर काफी झमेला हुआ था. और बाद में कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं के कहने पर राव को सत्ता मिली.और औ समय पद का शुक लेना नहीं, बल्कि कई सारी चुनौतियों से भरा हुआ था.
उस समय के तत्कालीन वित्तमंत्री मनमोहन सिंह जो बेहद शानदार अर्थशास्त्री के साथ काम शुरू किया भारत का बाजारग्लोबल कंपनियों के लिए खोल दिया गया. इसका असर यह हुवा की विदेशी कंपनियां देश आने लगीं. इससे न सिर्फ औद्योगिकीकरण को बढ़ावा मिला, बल्कि लोगों के लिए रोजगार भी जुटने लगा.इससे संपन्ना आने लगी.राव और मनमोहन की जोड़ी का बड़ा लक्ष्य राजकोषीय घाटे को कम करना था शुरुआत में अखरने वाले वित्तीय फैसलों का असर अच्छा रहा. अगर आज की बात करें तो हमारा विदेशी राजकोष लगभग 600 अरब डॉलर है.ये लगभग डेढ़ साल के लिए काफी है, वो भी ऐसे समय में, जब कोरोना के कारण ज्यादातर अमीर देशों की भी इकनॉमी भरभरा रही है.
नरसिम्हा राव को कई भाषाओं की जानकारी के लिए भी जाना जाता है. कहा जाता है कि उन्हें कुल 17 भाषाएं आती थीं. जिनमे भारत की भाषा के अलावा अंग्रेजी, स्पेनिश, जर्मन, ग्रीक, लैटिन, फारसी और फ्रांसीसी भाषा भी है. जितनी भाषाओ का ज्ञान नरसिम्हा राव को था उतना अब तक देश के किसी प्रधानमंत्री को नहीं आतीं.
बड़े फैसले लेकर देश को आर्थिक तौर पर मजबूत बनाने वाले राव को अपनी ही पार्टी कांग्रेस में खास अहमियत नहीं मिली प्रधानमंत्रित्व काल ख़त्म होने के बाद कांग्रेस पार्टी ने उनसे किनारा कर लिया. खुद राव ने भी 10 जनपथ जाना करीब बंद कर दिया था. साल 2004 में राव की मृत्यु के बाद कांग्रेस कमेटी के बाहर ही उनका शव रखा गया, न कि उसे अंदर रखने की इजाजत मिली. मृत्यु के बाद भी कांग्रेस ने अपनी कोई उपलब्धि गिनाते हुए राव का कभी जिक्र नहीं किया.