क्या हंसना सच में, तकलीफ को, कम करता है

  हास्य यानी हँसना, कभी दिल और मुंह खोलकर तो कभी दाँतों में पल्लू दबाकर अंदर ही अंदर हँस लेना.…
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हास्य यानी हँसना, कभी दिल और मुंह खोलकर तो कभी दाँतों में पल्लू दबाकर अंदर ही अंदर हँस लेना. लेकिन हँसी-ठिठोली की यह परंपरा इंसानी इतिहास का सबसे पुराना सोशल नेटवर्क कही जा सकती है. अपने आस-पास होने वाली दिनभर की ऊब मिटाने के लिए हमारे दादा-नाना शाम को किसी नीम या बरगद के पेड़ के नीचे जमावड़ा लगाते थे. अपनी मुश्किलों को हंसी में चुटकुलों और बतकहों में उड़ा देते थे. कभी किसी घटना को मजाक में उड़ा लिया तो कभी खुद का ही उड़ा लिया.

हिंदी साहित्य में तो हास्य रस के एक से बढ़कर एक कवि हुए हैं. चाहे काका हाथरसी हों, शैल चतुर्वेदी या अशोक चक्रधर, अपनी कलम से ही लोगों में मन में गुदगुदी पैदा कर देते हैं. इसी बात पर काका हाथरसी की एक ऐसी कविता पढ़ लीजिये जो है तो बहुत पुरानी लेकिन आज के समय में भी बिलकुल सटीक बैठती है. (दरअसल कई बार सच्चाई इतनी कड़वी होती है कि सुनते ही दुख के आंसुओं की जगह खिलखिलाहट वाली हंसी आ जाती है)

यह है कविता काका हाथरसी की- जन-गण मन के देवता, अब तो आँखें खोल
महँगाई से हो गया, जीवन डाँवाडोल
जीवन डाँवाडोल, ख़बर लो शीघ्र कृपालू
कलाकंद के भाव बिक रहे बैंगन-आलू
कहँ ‘काका’ कवि, दूध-दही को तरसे बच्चे
आठ रुपये के किलो टमाटर, वह भी कच्चे
राशन की दुकान पर, देख भयंकर भीर
‘क्यू’ में धक्का मारकर, पहुँच गये बलवीर
पहुँच गये बलवीर, ले लिया नंबर पहिला
खड़े रह गये निर्बल, बूढ़े, बच्चे, महिला
कहँ ‘काका’ कवि, करके बंद धरम का काँटा
लाला बोले-भागो, खत्म हो गया आटा

आपने देखा होगा कि स्टैंड-अप कॉमेडी का  ट्रेंड भी तेजी से जोर पकड़ रहा है. कारण यह कि हम, आप हर कोई अपनी जिंदगियों में कहीं ना कहीं परेशानियों और मुश्किलों से जूझ रहा है. ऐसे में जब उन्हीं परेशानियों को कोई चुटकुले के रूप में सुना देता है तो हमारा दिल हंस पड़ता है.फ़िल्में भी इस मामले में पीछे नहीं हैं. बॉलीवुड के शुरुआती दौर से ही फिल्मों में कॉमेडियन का चलन था. महमूद, उमा देवी, भगवान दादा, किशोर कुमार जैसे कलाकारों ने दर्शकों को हँसा-हँसाकर कुर्सियों से गिरने पर मजबूर कर दिया था. महमूद और किशोर कुमार की अद्वितीय फिल्म ‘पड़ोसन’ आज भी जब टीवी पर आती है, लोग पूरे परिवार के साथ उसे देखना पसंद करते हैं.इन दोनों ही कलाकारों की जबरदस्त जुगलबंदी वाला वो गीत ‘एक चतुर नार’ शायद आज भी आपको पूरा याद हो. अंगूर, हेरा फेरी, अंदाज अपना अपना जैसी फ़िल्में तो हम अक्सर अपना मूड बेहतर करने के लिए कई बार देख लेते हैं.

हंसने से कम हो जाता है गम- यह तो आपने भी सुना होगा कि हँसना सबसे अच्छी दवा है. किसी भी तकलीफ के दौर में अक्सर यह सुनने को मिल जाता है कि ‘हँसने से यह गम कम हो जाएगा’. सुनने में यह बहुत हाइपोथेटिकल सा लगता है. यह कैसे हो सकता है कि हम हँसे और सबकुछ ठीक हो जाए? आपका सोचना बिलकुल सही है. हँसने से हमारी तकलीफें तो कम नहीं होतीं लेकिन हां, दर्द को सहने कि हमारी क्षमता तो बढ़ ही जाती है.

बहुत सी शारीरिक क्रियाओं जैसे एक्सरसाइज, सेक्स या योग हमारे दिमाग में एंडोर्फिन नाम के केमिकल का स्राव बढ़ा देता है. लेकिन अब कुछ रिसर्च में यह पाया गया है कि हँसने से भी एंडोर्फिन हमारे रक्त में बहने लगता है. दरअसल जैसे ही हम हँसते हैं, हमारे चेहरे की 43 मांसपेशियां भी खिलखिलाने लगती हैं. इन मांसपेशियों का सिग्नल हमारे दिमाग को मिलता है. हमारे दिमाग में एक ग्रंथि है जिसे पिट्यूटरी ग्लैंड कहा जाता है. इस ग्लैंड से एंडोर्फिन और डोपामिन हॉर्मोन निकलकर रक्त में मिलते हैं. यहीं से ये हमारे दिमाग और स्पाइन में पहुंचकर शरीर को रिलैक्स करते हैं.

क्या हंसते समय कुछ नशा जैसा होता है- यह दोनों हॉर्मोन हमें एक हल्का सा नशा देते हैं. इसीलिए जब आप हँसते हैं तो अक्सर आप अपना संतुलन खो देते हैं और हँसते हँसते गिर जाते हैं. ये हल्का सा नशा हमारे शरीर द्वारा दर्द सहने की शक्ति भी बढ़ाता है. हँसते हुए दर्द कम होने की बात सिर्फ एक कहानी नहीं है. इसके लिए ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में एक विस्तृत रिसर्च हुई. सभी प्रतिभागियों कुछ मशहूर टीवी कॉमेडी शो जैसे ‘मिस्टर बीन्स’ और ‘फ्रेंड्स’ लगातार दिखाए गए. इसके साथ ही एक ग्रुप को एडिनबर्ग फ्रिंज फेस्टिवल के दौरान लाइव शो भी दिखाए गए.

लेकिन यहां पर एक ट्विस्ट था. सभी के हाथों पर ब्लड प्रेशर नापने वाला पट्टा कसकर बांधा गया था. जब लोग कोई कॉमेडी शो नहीं देख रहे थे जो पट्टे को कसकर हाथ पर बांधे रखने की उनकी क्षमता काफी कम थी. लेकिन जब वो कॉमेडी शो देख रहे थे तो अधिक प्रेशर तक वो अपने बाजुओं पर दबाव बिना किसी दर्द को महसूस किए हुए देख रहे थे. इस रिसर्च में यह देखा गया कि जैसे ही लोग हँसते हैं, उस हंसी के बाद दर्द को सह पाने कि उनकी क्षमता 10% तक बढ़ जाती है. इससे तय है कि एंडोर्फिन हमारी हँसी और दर्द को घटाने कि क्षमता के साथ सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है.

हालाँकि यह मुद्दा हास्य रस से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ नहीं है, लेकिन यह साफ जरूर करता है कि सभी रस आपस में किस तरह से जुड़े हुए हैं. दुनिया के सबसे बड़े विदूषक और कॉमेडियन असल जिंदगी में दुख और अवसाद के शिकार पाए गए हैं. चाहे रोबिन विलियम्स हों, जिम कैरी या कपिल शर्मा, हर कोई लोगों को हँसाने के चक्कर में अपनी खुशियों से दूर हो गए. शायद इस दुनिया में इन हास्य कलाकारों को हँसाने वालों कि भी सख्त जरूरत है.

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