“भारत-अमेरिका ट्रेड वॉर: गिरता निर्यात और बढ़ता दबाव, क्या सुलझ पाएगी व्यापार की उलझी गुत्थी?”

व्यापार समझौते पर गहराता संशय: भारत और अमेरिका के बीच बहुप्रतीक्षित द्विपक्षीय व्यापार समझौता (Trade Deal) वर्तमान में अनिश्चितता के…
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व्यापार समझौते पर गहराता संशय: भारत और अमेरिका के बीच बहुप्रतीक्षित द्विपक्षीय व्यापार समझौता (Trade Deal) वर्तमान में अनिश्चितता के भंवर में है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की “अमेरिका फर्स्ट” और “रेसिप्रोकल टैरिफ” (पारस्परिक कर) नीतियों ने दोनों देशों के बीच व्यापारिक वार्ता को कठिन बना दिया है। भारतीय कूटनीतिक हलकों में इस बात को लेकर गहरी चिंता है कि बार-बार बदल रहे अमेरिकी रुख के कारण एक संतुलित समझौते तक पहुंचना मुश्किल होता जा रहा है।

रूसी तेल और 500% टैरिफ की धमकी: विवाद का सबसे बड़ा केंद्र भारत द्वारा रूस से कच्चे तेल की खरीद है। अमेरिकी सीनेटरों और ट्रंप प्रशासन ने एक नया विधेयक (Sanctioning Russia Act 2025) तैयार किया है, जिसके तहत रूस से ऊर्जा उत्पाद खरीदने वाले देशों पर 500% तक का भारी-भरकम टैरिफ लगाने का प्रस्ताव है। अमेरिका इस कदम को रूस-यूक्रेन युद्ध रोकने के दबाव तंत्र के रूप में देख रहा है, जबकि भारत इसे अपनी संप्रभुता और आर्थिक हितों पर चोट मान रहा है।

भारतीय निर्यात पर आर्थिक चोट: अमेरिकी प्रशासन द्वारा पहले से ही भारतीय वस्तुओं पर लगाए गए 50% टैरिफ (जिसमें 25% पेनाल्टी टैरिफ शामिल है) का असर अब आंकड़ों में दिखने लगा है। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के अनुसार, मई से सितंबर 2025 के बीच अमेरिका को होने वाले भारतीय निर्यात में 37.5% की भारी गिरावट आई है। कपड़े, रत्न-आभूषण और इंजीनियरिंग सामान जैसे प्रमुख क्षेत्रों को इस व्यापारिक खींचतान के कारण भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।

मोदी-ट्रंप संवाद पर अमेरिकी दावा और भारत का जवाब: हाल ही में अमेरिकी वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लुटनिक ने दावा किया था कि पीएम मोदी ने ट्रंप को सीधे फोन नहीं किया, जिस कारण ट्रेड डील अटक गई। हालांकि, भारत के विदेश मंत्रालय ने इस दावे को “सटीक नहीं” बताते हुए कड़ा प्रतिवाद किया है। प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने स्पष्ट किया कि वर्ष 2025 में ही दोनों नेताओं के बीच आठ बार फोन पर बातचीत हो चुकी है और व्यापार वार्ता किसी व्यक्तिगत संवाद की कमी नहीं, बल्कि तकनीकी जटिलताओं के कारण रुकी है।

भारत का दृढ़ रुख और ऊर्जा सुरक्षा: भारी दबाव के बावजूद भारत ने स्पष्ट किया है कि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा से समझौता नहीं करेगा। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि भारत के निर्णय अपने 1.4 अरब नागरिकों के लिए किफायती ऊर्जा स्रोतों की उपलब्धता से निर्देशित होते हैं। भारत ने वैश्विक मंच पर साफ कर दिया है कि बाजार की बदलती परिस्थितियों के बीच वह अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए ही कच्चे तेल की सोर्सिंग जारी रखेगा।

आगे की राह और भविष्य की चुनौतियां: आगामी हफ्तों में अमेरिकी सीनेट में टैरिफ बिल पर होने वाली वोटिंग यह तय करेगी कि भारत-अमेरिका व्यापारिक संबंध किस दिशा में जाएंगे। जहां एक ओर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में ट्रंप के टैरिफ लगाने के अधिकारों पर कानूनी चुनौती दी गई है, वहीं दूसरी ओर भारत अपने निर्यात बाजारों में विविधता लाने (जैसे ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के साथ नई डील्स) की कोशिश कर रहा है। फिलहाल, पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप अपनी “दोस्ती” का इस्तेमाल कर इस ट्रेड वॉर को रोक पाएंगे।

News29

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