फौजा सिंह (जन्म 1 अप्रैल 1911 – मृत्यु 14 जुलाई 2025) एक ब्रिटिश-भारतीय सिख लंबी दूरी के धावक थे, जिन्हें इतिहास में सबसे उम्रदराज़ मैराथन धावक के रूप में जाना जाता है:
89 वर्ष की आयु में धावक बने, अपनी पत्नी और बेटे की मृत्यु के बाद व्यक्तिगत दुःख से उबरने के लिए लंबी दूरी की दौड़ शुरू की। 2000 में 89 वर्ष की आयु (6 घंटे 54 मिनट) में अपना पहला लंदन मैराथन पूरा किया, आयु-वर्ग का रिकॉर्ड तोड़ा।
2013 में 101 साल की उम्र में रिटायरमेंट तक उन्होंने नौ फुल मैराथन दौड़ीं, जिनमें टोरंटो 2011 भी शामिल है, जहाँ उन्होंने 100 साल की उम्र में लगभग 8 घंटे 11 मिनट में दौड़ पूरी की – ऐसा करने वाले वे पहले सौ साल के व्यक्ति थे।
व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शनों में 92 वर्ष की आयु में टोरंटो में 5 घंटे 40 मिनट की मैराथन दौड़, और स्प्रिंट तथा मध्यम दूरी की स्पर्धाओं में कई आयु-वर्ग के विश्व रिकॉर्ड शामिल हैं।
सम्मान: लंदन 2012 ओलंपिक के लिए मशालवाहक, एडिडास के “इम्पॉसिबल इज़ नथिंग” अभियान में शामिल, ब्रिटिश एम्पायर मेडल (2015) और एलिस आइलैंड मेडल ऑफ ऑनर (2003) से सम्मानित।
👴 बाद का जीवन और विरासत
1990 के दशक की शुरुआत से पूर्वी लंदन के इलफोर्ड में रहे, उसके बाद अपने पैतृक स्थान ब्यास पिंड, पंजाब लौट आए।
सादा शाकाहारी भोजन, शराब और तंबाकू से परहेज़, और इसी को अपनी जीवन शक्ति का श्रेय देते थे।
“उम्र कोई बाधा नहीं है” के अपने आदर्श वाक्य से दुनिया भर के लोगों को प्रेरित किया – और उन्हें टर्बन्ड टॉरनेडो और टर्बन्ड टॉरपीडो जैसे उपनाम मिले।
निधन
14 जुलाई 2025 को अपने गृहनगर ब्यास पिंड में पैदल चलते समय एक हिट-एंड-रन दुर्घटना में 114 वर्ष की असाधारण आयु में उनका दुखद निधन हो गया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पंजाब के राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया जैसे विश्व नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की और उन्हें दृढ़ता, प्रेरणा और फिटनेस का प्रतीक बताया।
फौजा सिंह की जीवन गाथा मानवीय दृढ़ता और खेल की शक्ति का एक असाधारण प्रमाण है। वह अक्सर कहते थे: “शुरुआती 20 मील मुश्किल नहीं होते… आखिरी छह मील मैं भगवान से बात करते हुए दौड़ता हूँ।”