पलक रवि से कहती है की में अब तुम्हारी माँ के साथ नहीं रह सकती मुझे अब अलग घरचाहिए । जहा में सुकून के साथ रह सखु इतना कहती है और पालक रवि पर चिल्ला देती ।हुवा कुछ ऐसा था की रवि माँ सुलभा जी ने बहु और बेटे से इतना कहा की तुम बहार जा रहे हो लेकिन रात में जल्दी वापस आ जाना ।बस फिर क्या था पलक ने इसी बात को हवा दे दी और और किरण के घर की किटी पार्टी में ही दूसरा घर देखने को कह दिया ।में मम्मी जी गुलाम बनकर नहीं रह सकती हु।
किरण ने पलकसे कहा में भी तुम्हारी तरह सोच कर अपनी सास से अलग हो गई थी। किटी ख़तम होते ही किरण पलक से बात की थी।तभी तो आप आज़ाद हो। पलक ने खुश होकर कहा तो किरण का आवाज मायूसी से भर गया, किरण पलक से दस साल बड़ी थी।नहीं,बल्कि तभी से मैं गुलाम हो गई,जिसको मैं गुलामी समझ रही थीसही मायने मे आज़ादी तो वही थी।
पलक पूछती वो कैसे ,किरण जब मैं ससुराल मे थी दरवाज़े पर कौन आया, मुझे मतलब नहीं था क्योंकि मैं वहाँ की बहू थी। घर मे क्या है क्या नहीं यह भी नहीं सोचती थी, दोनों बच्चे दादा-दादी से इतने घुल मिलकर थे। में कही आती जाती तो मुझपर कोई पाबंदी नहीं थी, पर कुछ नियमों के साथ, जो सही भी थे, पर में अपने ऊपर कोई सीमा रेखा नहीं चाहती थी। मुझे ये भी अच्छा नहीं लगता था की मेरा पति आफिस से आकर पहले अपने माँ बाप के पास जाते ।
तो!! फिर पलक ने पूछा ,मैंने दिनेश को हर प्रकार से मना कर दूसरा घर ले लिया और फिर मैं
दरवाजे पर आने वाले से लेकर बच्चों, धोबी, दिनेश सबके समय की गुलाम हो गई। में कई अपनी मर्जी से आ जा नहीं सकती थी क्यू कभी कभी बच्चों का होमवर्क तो कभी उनकी तबीयत खराब है।बच्चों साथ ले जा नहीं सकते तो उन्हें अकेला छोड़ना भी सही नहीं । तो मजबूरन पार्टियां के लिए मना करना पड़ता था जबकि ससुराल मे रहने पर ये सब रोक टोक नहीं थीं।ऊपर से मकान का किराया और ढेर सारे के खर्चे अलग, फिर दिनेश भी अब उतने खुश नहीं रहते।किरण की आँखें भर आई ।फिर आप वापस क्यों नहीं चली गयीं,किस मुँह से वापस लौटती
इन्होंने एक बार मम्मी से कहा भी था, पर पापा ने ये कह कर साफ़ मना कर दिया कि, एक बार हम लोगों ने बड़ी मुश्किल से अपने आप को संभाला है अब दूसरा झटका खाने की हमें हिम्मत नहीं है, बेहतर है अब तुम वहीं रहो।ओह!
पलक घर से निकलना आसन है लेकिन जब तक आप माँ-बाप के साये मे रहते हैं आपको बाहर के समस्या का जरा भी अहसास नहीं होता, माँ-बाप के साथ रोक टोक कम और अधिक आज़ादी होती है पर हमें वो अच्छी नहीं लगती । एक बार बाहर निकलने के बाद आपको पता चलता है कि आज़ादी के नाम पर आप अपने पाँव मे जंज़ीरें डाल लीं। बड़ी होने के नाते तुमसे कह रही हु सोच-समझ कर ही ये क़दम उठाना।
मन ही मन में पलक एक मिनिट मे फैसला ले चुकी थी-उसे किरण जैसी गुलामी करनी है । घर की जाते जाते वो मन ही मन खुश हो रही थी, की घर पहुंचते ही सासू मां के पैर छूकर क्षमा मांग लूंगी और सदा उनके साथ ही रहूँगी।