आज हम आपको बता रहे हैं भारत की पहली महिला जासूस के तौर पर पहचानी जाने वाली रजनी पंडित के बारे में. उनकी कहानी इन सब कल्पना से गढ़े गए किरदारों से काफी अलग है. मुंबई की रहने वाली रजनी पंडित अब तक 75 हजार से ज्यादा केस सुलझा चुकी हैं. उन्हें अपने तेज दिमाग से उलझी हुई गुत्थियों को सुलझाते हुए 35 साल से ज्यादा हो चुके हैं.
सीआईडी अधिकारी की बेटी रजनी पंडित के मुताबिक, वह बचपन में जासूस नहीं बनना चाहती थीं. उन्होंने मुंबई में मराठी साहित्य में पढ़ाई की है. जब वह कॉलेज में ही थीं, तभी उनकी एक दोस्त गलत संगत में पड़ गई थी. उनकी दोस्त ने सिगरेट और शराब पीना शुरू कर दिया था. यही नहीं, वह कुछ गलत लड़कों के साथ ज्यादा समय बिता रही थी. उन्होंने उस दोस्त से तोहफा भेजने की बात कहकर उसके ऑफिस का पता मांग लिया. इसके बाद उसके ऑफिस पहुंच गईं. इसके बाद उसके घर का पता निकाल लिया. फिर उसके घर पहुंचकर सबकुछ बता दिया. जब उसके घर वाले नहीं माने तो उन्हें सबकुछ दिखा दिया. इस पर उसके पिता ने कहा कि आप तो जासूस हो. बस यहीं से तय हो गया कि उन्हें भविष्य में क्या करना है.
अरेस्ट हुईं रजनी पंडित-रजनी पंडित एक बार खुद भी मुश्किल में फंस गई थीं. दरअसल, उन्हें और उनके कुछ साथी जासूसों को ठाणे पुलिस ने गलत ढंग से कॉल डिटेल रिकॉर्ड हासिल करने के मामले में गिरफ्तार कर लिया था. रजनी पर पांच क्लाइंट के लिए सीडीआर हासिल करने और बेचने का आरोप लगाया गया था. ठाणे पुलिस ने जासूस समरेश झा को गिरफ्तार करने के बाद रजनी को उनके घर से गिरफ्तार कर लिया. दरअसल, समरेश ने पुलिस को बताया था कि वह रजनी के कहने पर ही सीडीआर हासिल कर मोटा पैसा बना लेता था. इसमें कुछ लोगों को नवी मुंबई से भी पकड़ा गया था.
एक इंटरव्यू और चल पड़ी रजनी की एजेंसी- पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने रजनी पंडित को ‘फर्स्ट लेडी डिटेक्टिव’ अवॉर्ड से सम्मानित किया था. उन्हें महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की ओर से ये सम्मान दिया गया. उन्हें पहला अवॉर्ड 1990 में मिला था. इसके बाद उन्हें कई बार सम्मानित किया गया. उन्होंने 1991 में रजनी पंडित डिटेक्टिव सर्विसेस के नाम से अपनी एजेंसी शुरू की थी. उनका काम ठीकठाक चल रहा था. इसी दौरान उन्होंने दूरदर्शन को एक इंटरव्यू दिया. इसके बाद उनके पास काम की भरमार हो गई और उनकी एजेंसी चल पड़ी. उस समय उनके पास लैंडलाइन भी नहीं था. बाद में उन्होंने लैंडलाइन लगवा लिया तो रात के दो-दो बजे तक उनके पास केसेस को लेकर कॉल्स आती रहती थीं. अब उनकी एजेंसी 20 से ज्यादा लोग काम करते हैं.
जासूस होना चाहिए अच्छा एक्टर भी-वह कहती हैं कि एक डिटेक्टिव में हिम्मत के साथ एक्टिंग के गुण भी होने जरूरी हैं. दरअसल, हर नए केस के हिसाब से वह अपना हुलिया और पहचान बदल लेती थीं. वह कभी नौकरानी बनकर किसी के घर में काम करने पहुंच जाती थीं तो कभी गूंगी बहरी बनकर कहीं बैठ जाती थीं. कुछ केस में वह प्रेग्नेंट महिला बनकर भी जा चुकी हैं. वह अब तक दो किताबें ‘फेसेस बिहाइंड फेसेस’ और ‘मायाजाल’ लिख चुकी हैं. अब तक वह काफी लोगों को जासूसी का प्रशिक्षण भी दे चुकी हैं. उन्होंने अपने करियर में पिता-पुत्र की हत्या के मामले को सुलझाने में सबसे ज्यादा छह महीने का समय लिया था”