भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में चितरंजन दास का नाम कई योगदानों के कारण लिया जाता है. देशबंधु के नाम से मशहूर सीआर दास स्वतंत्रता सेनानी, सुप्रसिद्ध वकील, पत्रकार, कवि और राजनीतिज्ञ थे जिन्हें स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी एक स्वतंत्र छाप छोड़ी थी और कभी भी अपने सिद्धांतों और विचारों से समझौता नहीं किया और यहां तक कि उन्होंने गांधी जी (Mahatma Gandhi) का भी विरोध किया और अंजाम की परवाह नहीं की लेकिन गांधी जी के आंदोलन के लिए सपत्नीक जेल भी जाने से नहीं हिचकिचाए. उन्हें देशबंधु की उपाधि यूं ही नहीं दी गई थी. गुरुवार को उनकी 97वीं पुण्यतिथि है.
चितरंजन दास का जन्म 5 नवंबर 1870 को कोलकाता में वैद्य परिवार में हुआ था. वे कोलकाता उच्च न्यायलय के जाने माने वकील भुबन मोहनदास के पुत्र थे. उन्होंने कोलकत्ता के प्रेसिडेसी कॉलेज से स्नातक की पढ़ी की और फिर आईसीएस की परीक्षा भी दी जिसमें वे पास नहीं हो सके. इसके बाद उनहोने लंदन में वकालत की पढ़ाई की और फिर कोलकाता उच्च न्यायालय में वकालत शुरू की.
अरबिंदो घोष को बचाया- वकील के रूप में चितरंजन दास ने भारतीय राजनैतिक आरोपियों की पैरवी और ब्रह्माबंधाब उपाध्याय और भूपेंद्रनाथ दत्ता जैसे क्रांतिकारियों की पैरवी की जिन पर देशद्रोह का आरोप था. उन्हें साल 1908 में प्रसिद्धि मिली जब उन्होंने अलीपुर बम मामले में अरबिंदो घोष की सफल पैरवी कर उन्हें सजा से बचाया. वे क्रांतिकारियों के लिए मुकदमा तो लड़ते थे, लेकिन उनसे फीस नहीं लेते थे.वकालत में दास सफल तो रहे लेकिन उन्हें अंग्रेज और उनका शासन बहुत नापसंद था. शुरुआत में वे बंगाल की मशहूर क्रांतिकारी संगठन अनुशीलन समिति में भी सक्रिय रहे. इसके साथ वे वकालत और पत्रकारिता भी करने लगे. 1917 में उन्होंने सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया और वहां भी सफल रहे, लकिन उनका राजनैतिक सफल कम समय तक रहा.
स्वदेशी का विचार- उस समय के तिकड़ी लाल बाल पाल में से दास बिपिन चंद्र पाल के बहुत ही करीबी थे. उन्होंने एनी बेसेंट को कांग्रेस अध्यक्ष बनवाने में अहम भूमिका निभाई. दास स्वदेशी के विचार से बहुत ज्यादा प्रभावित थे. उन्होंने बंगाल में गांवों के पुनर्निर्माण , स्थानीय स्वशासन की स्थापना, और कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए काम किया.”
असहयोग आंदोलन-1920 गांधी जी की असहयोग आंदोलन में भी दास ने सक्रियता दिखाई. उन्हें अपनी आलीशान जीवनशैली छोड़ खादी को अपनाया और बंगाल में कई जगह ब्रिटिश कपड़ों का बहिष्कार किया. इस दौरान वे अपनी पत्नी और बेटे के साथ छह महीने के लिए जेल भी गए थे. उसी साल उन्हें अहमदाबाद अधिवेशन में कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया.
1922 में महात्मा गांधी ने चौरी चौरी कांड के बाद जब असहयोग आंदोलन बंद करने का ऐलान किया और दास ने उनका विरोध किया. दिसंबर 1922 में गया अधिवेशन में एक बार फिर कांग्रेस के अध्यक्ष बने लेकिन उनके असहयोग आंदोलन के प्रस्ताव के अस्वीकृत होने के कारण उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया और मोतीलाल नेहरू के साथ कांग्रेस में ही स्वराज पार्टी की स्थापना की.खादी अपनाते समय ही दास ने अपने सारी संपत्ति एक मेडिकल कॉलेज के नाम दान कर दी और देशसेवा में अपने जीवन के अंतिम समय तक लगे रहे. उनके इस त्याग और देशभक्ति के चलते ही उन्होंने देशबंधु कहा जाने लगा था. अपने जीवन के अंतिम समय में उन्हें स्वास्थ्य का साथ नहीं मिला और 16 जून 1925 को बीमारी की वजह से उनक निधन हो गया.