हॉकी के महान खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद की डायरी और इसमें दर्ज उनकी शायरी की चर्चा शायद ही कभी, कहीं हुई हो। देश-दुनिया में ओलंपिक में जीते उनके हॉकी के गोल्ड मेडल, 1936 में जर्मनी का ऐतिहासिक फाइनल मैच, उनके जादुई खेल कौशल के किस्से ही चर्चित रहे हैं।
बहुत कम लोगों को पता है कि हॉकी से अलग दादा ध्यानचंद का मन मनोरंजन और शायरी में भी रमता था। फुर्सत में वे शायरी लिखा करते थे। मेजर ध्यानचंद का जन्म 29 अगस्त सन् 1905 ई. को इलाहाबाद मे हुआ था। वो एक राजपूत परिवार में जन्मे थे । उनके जन्मदिन के अवसर पर उनकी डायरी से कुछ शायरी।
दरअसल, यह शेर हॉकी के जादूगर ‘पद्म विभूषण’ मेजर ध्यानचंद की कलम से निकला था। ध्यानचंद की निजी डायरी के पेज 8 पर 25 जनवरी 1968, गुरुवार को दर्ज यह शेर मशहूर अदाकारा जरीना वहाब को समर्पित है। मेजर ध्यानचंद के 296, प्रेमगंज, झांसी स्थित घर में सहेजी रखी गईं तमाम बेशकीमती थाती में से एक उनकी निजी डायरी भी है। इस छोटी-सी डायरी में ध्यानचंद के लिखे तमाम शेर दर्ज हैं, जिन्हें उन्होंने मशहूर अभिनेता-अभिनेत्रियों को समर्पित किया है।
ध्यानचंद ने पहला शेर खूबसूरत, बोलती आंखों वाली अभिनेत्री जरीना वहाब को समर्पित किया है। शायरी का सिलसिला गुरुवार, 25 जनवरी 1968 से शुरू होकर गुरुवार, 8 फरवरी पर जाकर खत्म हुआ है।
ध्यानचंद की निजी डायरी में सारे विवरण स्वयं उनके द्वारा लाल, नीली कलम के अलावा पेंसिल से भी दर्ज हैं, किंतु अभिताभ, रेखा, शशि कपूर, जरीना वहाब, ऋषि कपूर, हेमा मालिनी, सायरा बानो, रंजीता को समर्पित सभी शेर लाल कलम से लिखे गए हैं। शशि कपूर और रेखा को नज्र ध्यानचंद का शेर मुलाहिजा फरमाएं-
मुझे इसका गम नहीं है कि बदल गया जमाना,
मेरी जिंदगी है तुमसे कहीं तुम बदल न जाना।
ध्यानचंद का हेमा मालिनी के लिए लिखा यह शेर भी देखिए-
नाज था जिस पर मोहब्बत में साथ देंगे,
गुजरे जब जमाने से तो अजनबी से थे।
हॉकी में एक हजार गोल का अटूट रिकॉर्ड रचने वाले झांसी के ध्यानचंद की निजी डायरी उनके एक और पक्ष से भी खेल प्रेमियों को रूबरू कराती है। ध्यानचंद की डायरी में दर्ज शायरी को पढ़ते हुए उनके हॉकी विश्व कप विजेता पुत्र ओलंपियन अशोक ध्यानचंद सुखद अहसास से भर उठते हैं। उनके मुख से अनायास निकलता है, “वाह, क्या खूब बाबूजी (ध्यानचंद) की शायरी।
दद्दा ध्यानचंद की जादुई शायरी की डायरी उनकी लेखिका पुत्रवधू मीना उमेश ध्यानचंद ने 2007 में तब घर से ढूंढ निकाली थी, जब वह मेजर ध्यानचंद पर केंद्रित पुस्तक लिखने की तैयारी कर रही थीं। तभी से यह खास डायरी मीना ध्यानचंद ने अपने पास धरोहर के रूप में सहेज रखी है। वास्तव में ध्यानचंद की डायरी और शायरी से परिचय कराने का श्रेय उनकी साहित्यिक पुत्रवधू मीना ध्यानचंद को ही जाता है।