आज यानि 1 जुलाई को डॉक्टर्स डे पर परीक्षित निर्भय और मनीष कुमार सिंह ने जब देश के अलग-अलग हिस्सों से समाज के इन रक्षकों से बात की तो उन्होंने बस यही कहा- हम न डरे हैं, न थके हैं।और कोरोना महामारी के इस लड़ाई को अभी लड़ते रहेंगे और लोगों के जीवन को बचाएंगे।
कोरोना की दूसरी लहर में व्यवस्था बस देखने भर की थी। हर सांस से लड़ रहे कोरोना मरीजों के लिए न ऑक्सीजन थी और अस्पतालों में बिस्त,न दवाई इस संकट से लोग शहर-शहर धक्के खा रहे थे। शवों के बोझ तले श्मशान और कब्रिस्तान भी दब चुके थे लेकिन इस महामारी के प्रलय के बीच भी मरीजों का जीवन बचाने के लिए डॉक्टर डटे रहे। मरीजों के साथ-साथ कई सहकर्मियों व परिजनों को दम तोड़ते देख कर भी पीछे नहीं हटे। लोगों की तकलीपो के पहले चश्मदीद थे।सब कुछ ठीक होने की आशा में परिस्थिति से सामना कर रहे।
उन संकट के दिनों के बारे में सोचकर आज भी नींद नहीं आती। हर तरफ बुरा था। मैं 48-48 घंटे की आईसीयू में लगातार ड्यूटी दे रहा था। कई लोगों को हम आईसीयू में नहीं बचा सके, कई को बचाया भी। मुझे उस वक्त सबसे अनुभव यही होता था कि परिवार को मौत की खबर देने की जिम्मेदारी मेरी थी। मुझे आज भी उन दो मरीजों के चेहरे याद हैं जिनमें एक उम्र 35 और दूसरे की 37 साल श्री। मैंने खुशी-खुशी उनके परिवार को बताया कि मरीज को अगले दिन डिस्चार्ज कर देंगे , अब वह ठीक हैं, लेकिन उसके दो घंटे बाद अचानक मरीज की तबीयत बिगड़ने लगी और दोनों की मौत हो गई।
इसके बाद मेरी हिम्मत टूट गई। समझ नहीं आ रहा था कि उन लोगों को फिर से फोन करके कैसे यह खबर? खैर, मेरी आंखों में आंसू थे और आवाज भी दबी थी। मैंने परिवार को बताया और उन्होंने उस स्थिति को समझा भी।
डॉ. राहुल भारत रेजिडेंट, केजीएमयू , लखनऊकोविड यार्ड में पीड़ितों का पीपीई किट पहनकर इलाज करना आग की लपटों के बीच काम करने जैसा था। मरीज भी घबराहट में थे। लेकिन हमने मरीजों पर डर को कभी हावी नहीं होने दिया। मरीज जब ठीक होकर जाते थे, तो बहुत खुशी होती थी। लेकिन जिन्हें नहीं बचा पाते थे उनके लिए मन को खुभ ठेस लगती। कोरोना से बहन आकांधा ने भी चित्रकूट में दम तोड़ दिया।
पिता बना, बेटे से मिला नहीं मेरी पली भी चिकित्सक हैं। हाल में मैं पिता बना, लेकिन बेटे को ऑनलाइन ही देखा। मैं इस वक्त ब्लैक फंगस के मरीजों की जान बचाने में लगा हूँ।