पहले से अधिक भारत के लोग प्रकृति की जांनने लगे ही और उसका क्या महत्व है औ भी समझने लगे है आज हमारे पर्यावरण और जैव विविधता को किस प्रकार से हो रहे नुकसान को जानने के लिए कम से कम तीन गुना अधिक गूगल के जरिये सर्च और अध्ययन कर रहे हैं।कैसे पर्यावरण के हरे भरे पेड़ पौधे और उसमे रहने वाले जिव जंतु ख़त्म हो रही इस बारे दो गुना अधिक चिंता करने लगे हैं।प्रकृति का जो भी नुकसान हो रहा औ किस कारण हो रहा है उन उत्पादों की खोज लगाने में पिछले पांच सालों में लगभग 71% बढ़ चुकी है
ये दावे वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड की इकोनामिक इंटेलिजेंस यूनिट ने नए शोध में किए हैं। अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिन पर परिप्रेक्ष्य में जारी न्यूज़ के मुताबिक अपने भारत के साथ पूरी दुनिया में पर्यावरण को लेकर चिंता करने वाले नागरिकों की संख्या साल 2016 से 2020 के बीच 16% बढ़ चुकी है ऐसे देश जो अधिक विकास कर रहे है वहाँ नागरिकअधिक सावधान होने लगे हैं।इसे ‘इको अवेकनिंग’ नाम दिया गया है।
कई लोग ट्विटर के माध्यम से पर्यावरण के विषय पर 65% ज्यादा चर्चा हो रही है।राजनीती के नेता से लेकर ,धार्मिक नेता ,संगठन और दूसरे प्रभावशाली व्यक्तित्व इस विषय पर बात कर रहे हैं,अक्तूबर साल 2020 में महाराष्ट्र सरकार ने आरे नामक जंगलों को संरक्षित घोषित किया।
प्रकृति और जैव विविधता जैसे शब्दों का उपयोग तीन करोड़ से बढ़कर पांच हो चुका है। जिससे 100 करोड़ से ज्यादा लोगों तक पर्यावरण संरक्षण के संदेश पहुंच रहे हैं। परिणाम अक्तूबर 2020 में नजर आया, जब महाराष्ट्र सरकार ने आरे नामक जंगलों को संरक्षित घोषित किया।
प्रकृति को लेकर लोगो में जो जागरूकता आई है उसके बाद भी प्रकृति पर खतरा बना है अमेजन बेसिन से हर दिन 150 एकड़ वन जलाए और काटे जा रहे हैं।पृथ्वी पर रहने वाले 80 लाख जीव-जंतुओं की प्रजातियां में से आने वाले कुछ वर्षो में 10 लाख अधिक जीवों की प्रजातियां खत्म हो जाएंगी।