तराइन की पहली लड़ाई 1191 में अजमेर के चाहमान राजा पृथ्वीराज चौहान की सेना और घोर के मुहम्मद के नेतृत्व वाले गौरी साम्राज्य के बीच हुई थी। यह तराइन (हरियाणा, भारत में आधुनिक तरौरी) के पास लड़ी गई एक महत्वपूर्ण लड़ाई थी।
पृथ्वीराज चौहान ने पहले एक मुठभेड़ में घोर के मुहम्मद को हरा दिया था, लेकिन मुहम्मद अपने खोए हुए क्षेत्रों को फिर से हासिल करने के लिए दृढ़ थे। तराइन के प्रथम युद्ध में दोनों सेनाओं में भीषण संघर्ष हुआ। पृथ्वीराज चौहान की सेना ने बड़ी संख्या में घुड़सवार सेना और हाथियों के साथ पारंपरिक युद्ध रणनीति अपनाई। लड़ाई तीव्र थी, लेकिन घुरिद सेना रणनीतिक रूप से चौहान की सेना को मात देने में कामयाब रही, और शुरुआती असफलताओं के बावजूद, घोर की सेना के मुहम्मद विजयी हुए।
यह हार उत्तरी भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई, क्योंकि इसने घोर के मुहम्मद को इस क्षेत्र में पैर जमाने और अपने प्रभाव का विस्तार करने की अनुमति दी। इसके बाद घुरिद साम्राज्य और चाहमान राजवंश के बीच लड़ाई हुई, जिसके परिणामस्वरूप अंततः उत्तरी भारत के कुछ हिस्सों में घुरिद साम्राज्य का प्रभुत्व हो गया।