अधिकांशतह गावों में देख गया है कि लोग काम की तलाश में अपने घरो को छोड़कर अन्यत्र चले जाते हैं. ताकि रोज़ी-रोटी कमाकर अपनी आजीविका चला सके। लेकिन उत्तराखंड के मसूरी के पास स्थित टिहरी ज़िले के रौतू में बेली गांव के लोगों ने इसका विकल्प निकलकर नए तरीको को अपने जीवन यापन का साधन बनाया। जिसने स्थानीय निवासियों को पलायन न कर गांव में ही रोज़गार के अवसरो में बदल लिया.
एक समय में ,जब गांव के लोगों की आमदनी का ज़रिया सिर्फ़ खेती और पशुपालन था. यहां के लोग मसूरी और देहरादून जाकर दूध बेचा करते थे. इसी दौरान गांव के लोगों ने मसूरी में कुछ लोगों को पनीर बेचते देखा. तब उनके विचार में आया कि क्यों न उन्हें भी दूध की जगह पनीर बेचकर ज्यादा आमदनी की जा सकती है . गांव के लोगों ने पनीर का काम पहले छोटे तौर पर शुरू किया था, जो इनकी मेहनत से एक बड़े बिज़नेस के रूप में बदल गया. अब उत्तराखंड में रौतू की बेली गांव को कहते हैं ‘पनीर विलेज’, 250 परिवार वाले इस गांव की आबादी लगभग 1500 लोगों की है. तथा इस गांव के हर घर में पनीर बनाकर बेचने के कारण इसका नाम रखा गया
पहले गांव के 35 से 40 परिवार ही पनीर बनाते थे, लेकिन अब गांव के सभी परिवार इस काम से जुड़े हैं। यहां के पनीर की मांग टिहरी, उत्तरकाशी ही नहीं देहरादून, मसूरी से लेकर दिल्ली तक है। इस गांव में सबसे पहले पनीर बनाकर बेचने का काम कुंवरसिंह पंवार ने 1980 में शुरू किया था। तब पनीर चार से पांच रुपए किलो बिकता था।
अब बाज़ार में एक किलो पनीर की क़ीमत 220 रुपये से 240 रुपये तक है, जिससे ग्रामीणों को रोज़ अच्छी आमदनी हो जाती है. सड़क मार्ग से जुड़ा होने के चलते यहां का पनीर और फल-सब्ज़ियां मसूरी, देहरादून और उत्तरकाशी के बाज़ारों में भी बेची जाती हैं. दूध बेचने की जगह पनीर बेचने में ज़्यादा फ़ायदा है. अब तो गांव के युवा भी रोज़गार के लिए शहर न जाकर पनीर के व्यवसाय में ही लग गए हैं