मेरा आदर्श-बहती नदियाँ

मेरा आदर्श -बहती नदी जैसे गङ्गा मैया,नर्मदा मैया ऐसे जितनी भी नदियाँ बहती हैं अनवरत , लोककल्याणार्थ , रास्ते में…
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मेरा आदर्श -बहती नदी जैसे
गङ्गा मैया,नर्मदा मैया
ऐसे जितनी भी नदियाँ बहती हैं अनवरत , लोककल्याणार्थ , रास्ते में चट्टानों से टकराते हुवे , अपनी राह ख़ुद बनाते हुवे , निःस्वार्थ सेवा देने का संदेश देते हुवे , इन सब नदियों की सेवा अनुकरणीय है ,,,,

कविवर दिवंगत भाई प्रमोद तिवारी भी कहते हैं –
नदियाँ यानी हमारी ज़िंदगी

नदियाँ धीरे – धीरे बहना नदियाँ
घाट – घाट से कहना नदियाँ
मीठी – मीठी है मेरी धार
खारा – खारा सारा संसार !!!!

तुझको बहते जाना है
सागर का तट पाना है
सागर से पहले तुझको
गागर – गागर जाना है
सागर की बहना नदियाँ
गागर से कहना नदियाँ
गति में है जीवन का शृंगार
बाँधों ना पाँवों में दीवार नदियाँ ,,,,

रास्ते मुश्किल होते हैं
फिर भी हासिल होते हैं
बहती धारा के संग-संग
प्यासों के दिल होते हैं
बहना बस बहना नदियाँ
कुछ भी हो सहना नदियाँ
सब पे लुटाना अपना प्यार
कहना इसको कहते हैं धार नदियाँ ,,,,

प्रचलित गतियों से बचना
अपना पथ ख़ुद ही रचना
अपनी रचनाओं में फिर
छलकेंगीं गङ्गा-यमुना
अपना पथ अपना होगा
अपना रथ अपना होगा
अपनी ही होगी फिर रफ़्तार
अपनी कश्ती अपनी पतवार नदियाँ ,,,,

सीमाएँ क्या होती हैं
कैसे तोड़ी जाती हैं
तोड़ी सीमाएँ फिर से
कैसे जोड़ी जाती हैं
सबको समझाना नदियाँ
सबको बतलाना नदियाँ
सीमाओं में भी हैं विस्तार
साधो ना लहरों पर तलवार नदियाँ

सागर के घर जब जाना
थोड़ा सोना सुस्ताना
स्थिरता का सुख क्या है
इसकी तह तक भी जाना
किरणें सिर पर नाचेंगीं
सूरज का ख़त बाँचेंगी
ख़त में होगा जीवन का सार
फिर लेना बादल का अवतार नदियाँ ,,,,

इस पूरी रचना को हम अपने जीवन का आधार बनाकर दुर्लभमानव जीवन को धन्य कर सकते हैं !!!

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