होलिका दहन का, महत्व और परम्पराएं

होली का पर्व हर साल बड़े उल्हास के साथ मनाया जाता है हिंदू धर्म में होली पर्व का बहुत ही…
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होली का पर्व हर साल बड़े उल्हास के साथ मनाया जाता है हिंदू धर्म में होली पर्व का बहुत ही ज्यादा महत्व है होली के दिन सबसे पहले शाम के समय में होलिका दहन किया जाता है. होलिका दहन जिसे छोटी होली भी कहा जाता है ,वह बुराई पर अच्छाई का प्रतीक है। होलिका पूजा और दहन में परिक्रमा बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है. कहते हैं परिक्रमा करते हुए अगर अपनी इच्छा कह दी जाए तो वो सच हो जाती है. बस आपको अपनी .मनोकामना के हिसाब से करनी होगी होलिका की परिक्रमा. जैसी कामना उतनी ही बार परिक्रमा.

मान्यता है कि होलिका दहन के समय अग्नि की पुरे रीतिरिवाज के साथ से पूजा करने से मनुष्य के सभी दुःख दूर हो जाते है। घर परिवार में सुख-शांति आती है।होलिका दहन की अग्नि में हर चिंता खाक हो जाती है, दुखों का नाश हो जाता है और इच्छाओं को पूर्ण होने का वरदान मिलता है. बुराई पर अच्छाई की जीत के इस पर्व में जितना महत्व रंगों का है उतना ही होलिका दहन का भी है.

होलिका दहन के दूसरे दिन रंग के साथ होली से धूमधाम से होली मनाई जाती है । रंगो से बहरी इस होली को धुलंडी और फगवा भी कहा जाता है ।

पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में हिरण्यकश्यप नाम का एक असुर राजा था. उसे खुद पर इतना अभिमान था की खुद को ही भगवान मानने लगा था .हिरण्यकश्यप ने अपने राज्य और आस पास के लोगो को ईश्वर के नाम लेने पर ही रोक लगा दी थी.लेकिन राजा हिरण्यकश्यप और रानी कयादु का एक पुत्र प्रह्लाद हुवा था. जिसका नाम प्रह्लाद रखा गया था लेकिन प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था. राजा हिरण्यकश्यप को यह बिलकुल सहन नहीं हो रहा था की उसका पुत्र उसके सबसे बड़े शत्रु विष्णु का आरधय है.राजा हिरण्यकश्यप ने पुत्र प्रह्लाद को मारने की कई कोशिस की लेकिन वह कामयाब न हो सखा.

हिरण्यकश्यप की एक बहन थी जिसका नाम होलिका था. होलिका को आग में भस्म न होने का वरदान मिला हुआ था. एक बार हिरण्यकश्यप ने होलिका को आदेश दिया कि प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठ जाए. लेकिन आग में बैठने पर होलिका जल गई और प्रह्लाद बच गया. तब से ही ईश्वर भक्त प्रह्लाद की याद में होलिका दहन किया जाने लगा.

 

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