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एक द्वीप में समुद्री घास से बने घर साथ में ऑक्सीजन लेवल बड़ा

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डेनिश द्वीप लइसो में समुद्री शैवाल की एक खास प्रजाति ईलग्रास से घर बनाए जाते हैं. इनकी कुछ खासीयत है ये घर न कभी आग पकड़ते हैं,न इसमें जंग या कीड़े का भय रहता है और भूकंप जैसी आपदा में ताकत के साथ टिका रहता है अब, जबकि ग्लोबल वॉर्मिंग के वजह से धरती के अंदर हलचल बढ़ने लगी है और प्राकृतिक के एक बाद एक आपदाये सामने आ रही है

इन हालातो में अब विशेषज्ञ उन घरों पर जोर दे रहे हैं, जिसमें सीमेंट-लोहे का उपयोग कम होने  के बाद भी अधिक टिके है इससे पर्यावरण कोई हानि नहीं होगी डेनमार्क के लइसो द्वीप में ऐसे ही घर बने हुए हैं. शैवाल से बने ये घर कई पीढ़ियों तक टिकते हैं लकड़ी की कमी के साथ इस उपाय के साथ इस द्वीप पर ये अनोखी शुरुआत हुई थी.सही मायने में इस जगह पर समुद्र से नमक बनाने का व्यापर काफी फला-फूला.और तब उद्योग धंधों के लिएबड़े तेजी से पेड़ काटे गए और इसके कारण घर बनाने में लकड़ियों की कमी होने लगी और तभी से यह तरीका निकाला गया

समुद्र के बीचोंबीच बसे होने के कारण एक फायदा इस दिप को मिला है कई बार पोत समुद्रऔर जहाज के किसी प्रकार का हादसा होता है या टूट फुट के कारण द्वीप के तट से लगने पर ऐसे में लोग इन लकड़ियों को इकठा कर इनसे अपने घर बनाने में इस्तेमाल करने लगे और छतों के लिए समुद्री शैवाल का इस्तेमाल करते.

द्वीप में  साल 2012 से दोबारा  इस  तकनीक  को  जिंदा  किया  जा रहा है. इस दिप के निवासी स्वयं
ही इस तकनीक को फिर से लाने की कोशिश में हैं. वे घूम-घूमकर लोगों को बताते और अगर पक्की छत न बनी हो तो उसे समुद्री शैवाल की तकनीक से बनाने की बात करते हैं.वहीं महिलाएं घरों को मजबूत बनांने के लिए उपाय निकालने लगी उसी समय 17वीं सदी में इस छत का निर्माण हुआ. इसमें एक साथ 40 से 50 महिलाएं काम करती थी समुद्री तूफान के बाद किनारे आई शैवाल को सबसे पहले इख्ठा करती थी इसके बाद सबसे जरुरी काम शैवाल को सुखाना और इसे कम से कम 6 महीनों के लिए मैदान में सुखाया जाता था.इसे सुखाने से यह अधिक मजबूत  हो जाती है तब इसे छत पर बिछाया जाता था. एक छत 35 से 40 टन तक वजनी होती थी.

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