वह मिट्टी जिसमें पेड़ पौधे पनप सकते हैं, बनने में लाखों सालों का समय लगता है. इस मिट्टी को कायम रखने में पेड़ पौधों की महती भूमिका भी होती है. लेकिन मिट्टी बनने की उलट प्रक्रिया भी होती है जिसे मरुस्थलीकरण (Desertification) कहा जाता है. मरुस्थलीकरण भी लंबी प्रक्रिया है, लेकिन मिट्टी बनने की तुलना में यह कम लंबी है और मानवीय गतिविधियों और जलवायु परिवर्तन की दर के कारण मरुस्थलीकरण की दर में तेजी आई है जिसे सूखे की स्थिति एक मजबूती प्रदान करती है. इसके महत्व को रेखांकित करने के लिए ही संयुक्त राष्ट्र (United Nations) हर साल 17 जून को विश्व मरुस्थलीकरण और सूखा रोकथाम दिवस (World Day to Combat Desertification and Drought) मनाता है.
वैश्विक मुद्दे बनते जा रहे हैं मरुस्थलीकरण और सूखा- आज मरुस्थलीकरण और सूखा वैश्विक आयाम वाले मुद्दे हो चुके हैं क्योंकि इनका पूरी दुनिया के इलाकों पर असर दिखाई देता है. इससे निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय को मिलजुल कर कदम उठाने होंगे. संयुक्त राष्ट्र का मानना है कि ऐसा अफ्रीका के मामले में बहुत जरूरी है जहां मरुस्थलीकरण और सूखे का व्यापक असर देखने को मिल रहा है.
क्या है इस साल की थीम- संयुक्त राष्ट्र ने दिसंबर 1994 को अपने A/RES/49/115 संकल्प प्रस्ताव के जरिए 17 जून को मरुस्थलीकरण और सूखा रोकथाम दिवस मनाने का ऐलान किया था. इस साल संयुक्त राष्ट्र ने इस दिवस के लिए “राइजिंग अप फ्रॉम ड्रॉट टुगेदर” यानि “सूखे से मिलकर ऊपर उठना” थीम रखी है जिसमें पृथ्वी के पारिस्थितिकी तंत्रों के विनाशकारी नतीजों से बचने के लिए कदम उठाने की जरूरत पर जोर दिया है.
मरुस्थलीकरण की प्रक्रिया- मरुस्थलीकरण शुष्क, अर्ध शुष्क, और सूखे उप आर्द्र क्षेत्रों में भूमि के निम्नीकरण की प्रक्रिया को कहते हैं. इसमें मिट्टी में ऊर्वरता कम होने के साथ उसमें वे सभी पदार्थ कम होते जाते हैं जो पेड़ पौधों के पनपने में सहायक होते हैं. ऐसे में मिट्टी अपने मूल गुण ही खो बैठती है और उसमें रेत की बहुलता हो जाती और उसकी जमीन एक मरुस्थल में बदल जाती है. इसका कारण मानव गतिविधियां, जलवायु विविधता प्रमुख रूप से होते हैं.
सूखों का बढ़ता असर- आज इंसान को अपनी जीवनशैली में ही ऐसे बदलाव लाने हैं जिनसे उसके पर्यावरण पर विपरीत प्रभाव ना पड़े. इस तरह के नीति संधारणीय विकास की ओर अग्रसर करती है. इसके लिए सबसे बड़े खतरों में सूखा प्रमुख तौर से शामिल है. सूखे विशेष तौर पर विकासशील देशों की समस्या हैं, लेकिन ये विकसित देशों में भी बढ़ रहे है. अनुमान है कि साल 2050 तक सूखे दुनिया की तीन चौथाई आबादी के प्रभावित करने लगेंगे.”
पूरी दुनिया को चपेट में लेने की ओर- वैश्विक मौसम विभाग के मुताबिक साल 2000 से, उसके पिछले दो दशकों की तुलना में, दुनिया में सूखे की संख्या और अवधि में 29 प्रतिशत का इजाफा हुआ है. जहां पहले से ही दुनिया के 2.3 अरब लोग पानी की कमी की समस्या का दबाव झेल रहे हैं, सूखे बहुत बड़ी समस्या बनते जा रहे हैं. ऐसे इलाकों की संख्या बढ़ती जा रही है जहां लोग पानी की समस्या से जूझ रहे हैं.
सूखे का हर देश पर असर- यूनिसेफ के आंकलन के मुताबिक साल 2040 तक चार में से एक बच्चा पानी की कमी से जूझने वाले इलाके में रहने वाला होगा. आज भी ऐसा कोई देश नहीं हैं जो सूखे से पूरी तरह से बचा हुआ हो. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक हर साल दुनिया के 5.5 करोड़ लोग सूखे से सीधे तौर पर प्रभावित होते हैं.
इस समस्या को अब ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है. जब भूमि का पतन होता है और उसकी उत्पादकता खत्म हो जाती है, तब प्राकृतिक क्षेत्र बेकार होते जाते हैं. ग्रीनहाउस गैसों का दुष्प्रभाव बढ़ने लगता है और जैवविविधता कम होने लगती है. संयुक्त राष्ट्र इसीलिए इस बात पर जोर दे रहा है कि लोग इस संकट से निपटने के लिए संयुक्त रूप से प्रयास करें.